कल नरेश के पिता की मृत्यु हो गई। उसने दोस्तों को इन्फॉर्म करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया। उसने अपने स्टेटस पर पोस्ट किया ,"पिता की मृत्यु हो गई है ,अंतिम संस्कार कल रविवार को सुबह 11 बजे होगा। अलग से कोई कार्ड नहीं भेजा जा रहा है। " जिस ने भी दोस्त के स्टेटस को देखा "लाइक " कर दिया।नरेश अपने स्टेटस को देख कर खुश था। शाम तक उसके स्टेटस में "550 लाइक" जुड़ चुके थे।
Tuesday, 10 June 2014
Saturday, 7 June 2014
A LETTER...... EK CHITHEE PART-14
दोस्तों ,
नमस्कार।
लगभग एक महीना हो गया है आप से रूबरू हुए। पिछला ख़त 7 अप्रैल को लिखा था। लिखने की ज़रुरत नहीं के विश्व के सब से बड़े और महानतम लोकतंत्र हिंदुस्तान में सत्ता परिवर्तन हो चुका है।नरेंदर दामोदर दास मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपना काम शुरू कर दिया है। अब तक की कार्यवाही से लग रहा है के जल्द ही देश में सार्थक परिवर्तन देखने को मिलेंगे। अपने मंत्री साथियों को पाँव छूने के बजाए काम करने पर बल देने की सलाह की सभी जगह प्रसंशा की जा रही है।
अप्रैल और मई का महीना कैसे बीता कुछ पता ही नहीं चला। याद करने की कोशिश करता हूँ तो लगता है के पिछले दो महीने जैसे बिना कोई सार्थक काम किए बीत गए। कर्ण पब्लिक स्कूल में काम करते करते और बच्चों के बीच रहते हुए समय कैसे उड़न छू हो जाता है ,सच में पता नहीं चलता। ये दो महीने पूरी तरह से स्कूल को समर्पित रहते हैं। एक तरफ बच्चों के एडमिशन का दबाव रहता है तो दूसरी और बच्चों को सही शिक्षा प्रदान करने के लिए सक्षम अध्यापकों के चयन के लिए भी खासी मशक्क़त करनी पड़ती है।शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इंग्लिश मीडियम की अंधी दौड़ बच्चों के भविष्य के साथ क्या गुल खिलाएगी,भगवान ही जानें।
अमेरिका से आए पारिवारिक दोस्त मंजीत चीमा से मण्ढौर (अम्बाला )में मुलाक़ात हुई। उनकी पत्नि भी साथ थी। फॉर्मल बातचीत के बाद फ़ोटो सैशन हुआ और एक दूसरे से विदा ली। आजकल मोबाइल फ़ोन ही कैमरा बन गए हैं। झटपट फ़ोटो खींचो और डाल दो सोशल साइट पर।मंजीत भाई अमेरिका आने से पहले कभी कभी बात कर लिया करते थे लेकिन इस मुलाक़ात के बाद अभी तक उन से कोई बात नहीं हुई।
पिछले वर्ष शूट हुई फिल्म भुजंग के प्रदर्शन का सभी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। ख़ासकर कर्ण पब्लिक स्कूल करनाल के बच्चे। यही नहीं चंडीगढ़ से सुरेन भी अक्सर मैसेज कर पूछ लेता है ,"सर जी कब आ रही है। "यही नहीं फिल्म में एक अहम रोल निभाने वाले कलाकार समीर ने तो प्रण कर लिया है के इस फिल्म के रिलीज़ होने के बाद ही वो कोई अगली फिल्म साइन करेगा। फिल्म के डायरेक्टर मोहिन्दर से इस सिलसिले में जब भी बात होती है तो उस का बस यही जवाब होता है ,"यार फिल्म सबमिट करवा दी है और पास भी हो गई है ,आगे पैसे रिलीज़ करें तो पोस्ट प्रोडक्शन का काम शुरू करें। "सरकारी तंत्र में स्टैम्प लगवाने और फाइलों को इधर उधर करवाने के चक्कर में लोगों के सपने कैसे दब कर रह जाते हैं। ये इस का अच्छा उदाहरण है। हालांकि मोहिन्दर पूर्ण रूप से आशान्वित है के फिल्म १००%रिलीज़ होगी। कल उस की डिपार्टमेंट के लोगों से मीटिंग भी है। "शुभकामनायें दोस्त। "
गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी हैं। पारा 47*तक पहुँच चुका है। गर्म हवाओं और आग उगलती गर्मी के कारण दोपहरी को बाहर निकलना मुश्किल हो गया है।आज कल अलसुबह सैर पर निकल जाता हूँ। अपने मोबाइल से कुछ फोटो खींच कर फेस बुक पर अपलोड कर देता हूँ। आजकल तरबूज़ बेचने वाले जगह -जगह नज़र आ जाते हैं। अपनी सेहत को लेकर लोग जागरूक हो गए हैं। हर जगह योग शिविर चल रहे हैं। आप सब भी अपनी सेहत का ध्यान रखें। इस उम्मीद के साथ के फिर मिलेंगे ,अलविदा दोस्तों !
To be continued.............!
नमस्कार।
लगभग एक महीना हो गया है आप से रूबरू हुए। पिछला ख़त 7 अप्रैल को लिखा था। लिखने की ज़रुरत नहीं के विश्व के सब से बड़े और महानतम लोकतंत्र हिंदुस्तान में सत्ता परिवर्तन हो चुका है।नरेंदर दामोदर दास मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपना काम शुरू कर दिया है। अब तक की कार्यवाही से लग रहा है के जल्द ही देश में सार्थक परिवर्तन देखने को मिलेंगे। अपने मंत्री साथियों को पाँव छूने के बजाए काम करने पर बल देने की सलाह की सभी जगह प्रसंशा की जा रही है।
अप्रैल और मई का महीना कैसे बीता कुछ पता ही नहीं चला। याद करने की कोशिश करता हूँ तो लगता है के पिछले दो महीने जैसे बिना कोई सार्थक काम किए बीत गए। कर्ण पब्लिक स्कूल में काम करते करते और बच्चों के बीच रहते हुए समय कैसे उड़न छू हो जाता है ,सच में पता नहीं चलता। ये दो महीने पूरी तरह से स्कूल को समर्पित रहते हैं। एक तरफ बच्चों के एडमिशन का दबाव रहता है तो दूसरी और बच्चों को सही शिक्षा प्रदान करने के लिए सक्षम अध्यापकों के चयन के लिए भी खासी मशक्क़त करनी पड़ती है।शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इंग्लिश मीडियम की अंधी दौड़ बच्चों के भविष्य के साथ क्या गुल खिलाएगी,भगवान ही जानें।
अमेरिका से आए पारिवारिक दोस्त मंजीत चीमा से मण्ढौर (अम्बाला )में मुलाक़ात हुई। उनकी पत्नि भी साथ थी। फॉर्मल बातचीत के बाद फ़ोटो सैशन हुआ और एक दूसरे से विदा ली। आजकल मोबाइल फ़ोन ही कैमरा बन गए हैं। झटपट फ़ोटो खींचो और डाल दो सोशल साइट पर।मंजीत भाई अमेरिका आने से पहले कभी कभी बात कर लिया करते थे लेकिन इस मुलाक़ात के बाद अभी तक उन से कोई बात नहीं हुई।
पिछले वर्ष शूट हुई फिल्म भुजंग के प्रदर्शन का सभी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। ख़ासकर कर्ण पब्लिक स्कूल करनाल के बच्चे। यही नहीं चंडीगढ़ से सुरेन भी अक्सर मैसेज कर पूछ लेता है ,"सर जी कब आ रही है। "यही नहीं फिल्म में एक अहम रोल निभाने वाले कलाकार समीर ने तो प्रण कर लिया है के इस फिल्म के रिलीज़ होने के बाद ही वो कोई अगली फिल्म साइन करेगा। फिल्म के डायरेक्टर मोहिन्दर से इस सिलसिले में जब भी बात होती है तो उस का बस यही जवाब होता है ,"यार फिल्म सबमिट करवा दी है और पास भी हो गई है ,आगे पैसे रिलीज़ करें तो पोस्ट प्रोडक्शन का काम शुरू करें। "सरकारी तंत्र में स्टैम्प लगवाने और फाइलों को इधर उधर करवाने के चक्कर में लोगों के सपने कैसे दब कर रह जाते हैं। ये इस का अच्छा उदाहरण है। हालांकि मोहिन्दर पूर्ण रूप से आशान्वित है के फिल्म १००%रिलीज़ होगी। कल उस की डिपार्टमेंट के लोगों से मीटिंग भी है। "शुभकामनायें दोस्त। "
गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी हैं। पारा 47*तक पहुँच चुका है। गर्म हवाओं और आग उगलती गर्मी के कारण दोपहरी को बाहर निकलना मुश्किल हो गया है।आज कल अलसुबह सैर पर निकल जाता हूँ। अपने मोबाइल से कुछ फोटो खींच कर फेस बुक पर अपलोड कर देता हूँ। आजकल तरबूज़ बेचने वाले जगह -जगह नज़र आ जाते हैं। अपनी सेहत को लेकर लोग जागरूक हो गए हैं। हर जगह योग शिविर चल रहे हैं। आप सब भी अपनी सेहत का ध्यान रखें। इस उम्मीद के साथ के फिर मिलेंगे ,अलविदा दोस्तों !
To be continued.............!
Friday, 30 May 2014
chunav
दुम हिलाते
निकल पड़ा है
कुतों का झुण्ड
ये मत समझना
के
वफादार
हो गए हैं ,
ध्यान रखना
ये
कुते
काटने
वाले हैं !
निकल पड़ा है
कुतों का झुण्ड
ये मत समझना
के
वफादार
हो गए हैं ,
ध्यान रखना
ये
कुते
काटने
वाले हैं !
Friday, 23 May 2014
AJAB GAJAB KI RAJNEETI
दोस्तों ! देश के अलग अलग हिस्सों में मतदान की प्रक्रिया और चुनावी वायरल का यौवन समाप्त हो चुका है। देश और देश के लोगों का भाग्य जिन ई वी एस मशीनों में बंद हुआ था वो जादुई पिटारा १६ मई को खुला चुका है और पता लग गया है के देश के लोग वास्तव में क्या चाहते हैं।चुनावी फ़िज़ा में बदलाव तो स्पष्ट नज़र आ रहा था। परन्तु असल में देश के लोगों के मन की बात १६ मई को ही पता चल पाई।बचपन में सुना करते थे के "इट इज़ ऑल फेयर इन लव एंड वॉर।" देश के अलग अलग हिस्सों में हुए चुनावी प्रचार -प्रसार को देखा तो "इट इज़ ऑल फेयर इन पॉलिटिक्स " के मायने भी समझ आने लगे।
राजनीतिज्ञों के लिए सत्ता लोलुपता और राजनितिक महत्वकांक्षा इतनी महत्वपूर्ण हो गई है के इन लोगों ने सभी नियमों को ताक़ पर रख दिया। कुछ दिनों पहले की ही तो बात है मेरे एक मित्र ने मज़ाक -मज़ाक में कहा था," कितना अच्छा हो यदि सभी नियमों को तोड़ दिया जाए। "मैंने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा तो वो तुरंत बोला ,"कितना मज़ा हो अगर होली वाले दिन बॉम्ब पटाखे बजाए जायें और दीपावली वाले दिन लोग एक -दूसरे को रंग गुलाल लगाएं। "साथ ही उसने तर्क भी दिया ,"सब कुछ एक ही तरह से करते करते जीवन बेरंग और बेमज़ा हो गया है। "
बिल्कुल ऐसा ही हाल हमारे देश की राजनीति का भी रहा। राजनीतिज्ञों को भी ये समझ आ गया के अब के बार कुछ भी सीधा नहीं।लोगों में आपसी भाई चारे की बात करने वाले नेताओं ने झूठे वायदे और धार्मिक उन्माद फैलाने वाले भाषण दिए। नेताओं या पार्टी ने बेरोज़गारी ,गरीबी , महंगाई ,भ्रष्टाचार ,देश का भविष्य बच्चों और युवाओं के लिए शिक्षा व स्वास्थय सेवाओं, महिलाओं ,मज़दूरों या किसानों के बारे में बात तो की लेकिन संजीदगी से नहीं। एक दूसरे पर औछी टिप्पणी का जैसे प्रचलन सा ही हो गया था। बातों -बातों और इशारों -इशारों में एक दूसरे को नंगा करने की कोशिश कुछ इस तरह से की गई मानो कहना चाह रहे हों के चुनाव भी हमाम की तरह है ,जहाँ सब को एक बार नंगा तो होना ही पड़ता है। इस बार तो ऐसा लगा मानो चुनाव नहीं बल्कि दंगल हो। दंगल में पहलवान अपने लंगोट कस कर मैदान में उतरते हैं परन्तु यहाँ तो सभी के लंगोट खिसकते नज़र आए।
क्या यही राजनीति के असल मायने हैं ! कोई किसी की बीवी के बारे में सवाल पूछ रहा था तो कोई किसी के पति पर सवालिया निशान लगा रहा था। कोई माँ की ममता में अंधेपन का ज़िक्र कर के लोगों को अपनी आँखें खोलने की अपील कर रहा था तो कोई राजकुमार से शादी न करने का कारण पूछ रहा था। मौसमी पारे के बढ़ने के साथ -साथ चुनावी गर्मी भी बढ़ती गई। बाबा जी भी चुनावी दंगल में कूद गए। शायद भूल गए के दंगल में लंगोट कस कर रखना पड़ता है और सत्संग में बोल पर नियंतरण रखना ज़रूरी है।पर बाबा कहाँ रुकने वाले। ऐसे में सोशल मीडिया भी पीछे नहीं रहा। कहीं चाय वाले के कपड़ों का ज़िक्र हुआ तो कहीं बाबा को औरतों के कपड़ों में दिखा कर उन्हें भगोड़ा प्रमाणित करने का प्रयास किया गया। जाति के नाम को भुनाने का समय आया तो छाती ठोक कर अपना प्रमाण पत्र दिया। कुल मिला कर एक दूसरे की माँ बहन करने में किसी ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी।
शहजादे ,गुड़िआ ,मैडम ,टॉफ़ी ,गुब्बारे जैसे शब्दों का प्रयोग तो इस तरह किया गया मानो नेता लोग छोटे बच्चों की तरह गुड़िआ -गुड़िआ खेल रहे हों।
खैर इस बार अजब गजब तो हुआ ! सब कुछ पहले जैसा नहीं हुआ ! मतदान प्रतिशत भी बढ़ा। लोग भी जागरूक हुए ! लहर और सुनामी का असर भी देखने को मिला। परिवार वाद को अलविदा के साथ विश्व की सब से बड़ी और महानतम लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के ज़रिए सत्ता परिवर्तन की एक नई दास्ताँ भी लिखी गई।
२६ मई को देश का नया प्रधानमंत्री शपथ लेगा। शेर की तरह चलने और दहाड़ने वाला नरेंदर मोदी देश के १२५ सौ करोड़ लोगों की उम्मीदों पर कैसे खरा उतरता है ,ये आने वाले समय में कबीले गौर करने वाला होगा।
राजनीतिज्ञों के लिए सत्ता लोलुपता और राजनितिक महत्वकांक्षा इतनी महत्वपूर्ण हो गई है के इन लोगों ने सभी नियमों को ताक़ पर रख दिया। कुछ दिनों पहले की ही तो बात है मेरे एक मित्र ने मज़ाक -मज़ाक में कहा था," कितना अच्छा हो यदि सभी नियमों को तोड़ दिया जाए। "मैंने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा तो वो तुरंत बोला ,"कितना मज़ा हो अगर होली वाले दिन बॉम्ब पटाखे बजाए जायें और दीपावली वाले दिन लोग एक -दूसरे को रंग गुलाल लगाएं। "साथ ही उसने तर्क भी दिया ,"सब कुछ एक ही तरह से करते करते जीवन बेरंग और बेमज़ा हो गया है। "
बिल्कुल ऐसा ही हाल हमारे देश की राजनीति का भी रहा। राजनीतिज्ञों को भी ये समझ आ गया के अब के बार कुछ भी सीधा नहीं।लोगों में आपसी भाई चारे की बात करने वाले नेताओं ने झूठे वायदे और धार्मिक उन्माद फैलाने वाले भाषण दिए। नेताओं या पार्टी ने बेरोज़गारी ,गरीबी , महंगाई ,भ्रष्टाचार ,देश का भविष्य बच्चों और युवाओं के लिए शिक्षा व स्वास्थय सेवाओं, महिलाओं ,मज़दूरों या किसानों के बारे में बात तो की लेकिन संजीदगी से नहीं। एक दूसरे पर औछी टिप्पणी का जैसे प्रचलन सा ही हो गया था। बातों -बातों और इशारों -इशारों में एक दूसरे को नंगा करने की कोशिश कुछ इस तरह से की गई मानो कहना चाह रहे हों के चुनाव भी हमाम की तरह है ,जहाँ सब को एक बार नंगा तो होना ही पड़ता है। इस बार तो ऐसा लगा मानो चुनाव नहीं बल्कि दंगल हो। दंगल में पहलवान अपने लंगोट कस कर मैदान में उतरते हैं परन्तु यहाँ तो सभी के लंगोट खिसकते नज़र आए।
क्या यही राजनीति के असल मायने हैं ! कोई किसी की बीवी के बारे में सवाल पूछ रहा था तो कोई किसी के पति पर सवालिया निशान लगा रहा था। कोई माँ की ममता में अंधेपन का ज़िक्र कर के लोगों को अपनी आँखें खोलने की अपील कर रहा था तो कोई राजकुमार से शादी न करने का कारण पूछ रहा था। मौसमी पारे के बढ़ने के साथ -साथ चुनावी गर्मी भी बढ़ती गई। बाबा जी भी चुनावी दंगल में कूद गए। शायद भूल गए के दंगल में लंगोट कस कर रखना पड़ता है और सत्संग में बोल पर नियंतरण रखना ज़रूरी है।पर बाबा कहाँ रुकने वाले। ऐसे में सोशल मीडिया भी पीछे नहीं रहा। कहीं चाय वाले के कपड़ों का ज़िक्र हुआ तो कहीं बाबा को औरतों के कपड़ों में दिखा कर उन्हें भगोड़ा प्रमाणित करने का प्रयास किया गया। जाति के नाम को भुनाने का समय आया तो छाती ठोक कर अपना प्रमाण पत्र दिया। कुल मिला कर एक दूसरे की माँ बहन करने में किसी ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी।
शहजादे ,गुड़िआ ,मैडम ,टॉफ़ी ,गुब्बारे जैसे शब्दों का प्रयोग तो इस तरह किया गया मानो नेता लोग छोटे बच्चों की तरह गुड़िआ -गुड़िआ खेल रहे हों।
खैर इस बार अजब गजब तो हुआ ! सब कुछ पहले जैसा नहीं हुआ ! मतदान प्रतिशत भी बढ़ा। लोग भी जागरूक हुए ! लहर और सुनामी का असर भी देखने को मिला। परिवार वाद को अलविदा के साथ विश्व की सब से बड़ी और महानतम लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के ज़रिए सत्ता परिवर्तन की एक नई दास्ताँ भी लिखी गई।
२६ मई को देश का नया प्रधानमंत्री शपथ लेगा। शेर की तरह चलने और दहाड़ने वाला नरेंदर मोदी देश के १२५ सौ करोड़ लोगों की उम्मीदों पर कैसे खरा उतरता है ,ये आने वाले समय में कबीले गौर करने वाला होगा।
Wednesday, 21 May 2014
achhe din aane vaale hain.......!
अच्छे दिन आने वाले हैं................. !
लो जी विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र हिंदुस्तान की राजनीति में विश्व रिकॉर्ड बन गया है। स्वतन्त्र देश में जन्म लेने वाला पहला व्यक्ति २६ मई को विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहा है।पिछले करीब 65 साल से देश की सत्ता पर काबिज कांग्रेस की ये सब से बढ़ी हार हुई है।
नरेंद्र मोदी द्वारा लोकसभा के सेंट्रल हॉल में दिए गए भाषण को सुन रहा था। वाह जी वाह मोदी जी !आप तो छा गए। कमाल का भाषण दिया। तालियां बजीं ,आंसू बहे ,माँ को याद किया गया। अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की फिल्म का डायलाग याद आ गया , "मेरे पास माँ है। " टीवी वाले अलग -अलग ढंग से आप के भाषण को बार -बार दिखा रहे हैं। दिखाएँ भी क्यों ना.……टी आर पी का चक्कर जो है।
यही नहीं संसद में प्रवेश से पहले जिस तरहां से नतमस्तक हो कर सलाम किया गया वो सच में काबीले तारीफ़ है।आडवाणी और वाजपायी को जिस तरह से सम्मान दिया गया उस से भारतीय संस्कृति को बखूबी प्रचारित और प्रसारित करने में आप कामयाब हुए हैं।
ये बाल धुप में सफ़ेद नहीं किए हैँ ,इस लकोक्ति के मायने समझ आने लगे हैं। समझ में आने लगा है के किला फ़तेह करने के लिए कला और कौशल दोनों की ज़रुरत होती है।जोकि मोदी ने बखूबी किया है। पूरा देश मोदीमय हो गया है। मोदी के बोलने के स्टाइल की वाजपाई के साथ तुलना की जा रही है।
आशावाद ,देशभक्ति ,महिलाओं की सुरक्षा ,गरीबों के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए जिस तरह मोदी ने संसद में बैठे जनप्रतिनिधिओं को सरकार के मायने बताए वो निःसंदेह सराहनीय है।सरकार का मतलब है लोगों की सरकार ,जो लोगों के बारे में सोचे और जो लोगों के सपने ले। वाह जी वाह मोदी जी। आपने संसद में अपने पहले भाषण से अपने साथिओं को जो संकेत दिए हैं ,मैं उस की मुक्त कंठ से प्रसंशा करता हूँ। राह आसान नहीं है परन्तु यदि होंसले बुलंद हों और नियत में कोई खोट न हो तो मंज़िल नज़दीक नज़र आने लगती है।
मोदी को हिंदुस्तान की जनता ने जिस तरह से बहुमत दिया है उससे मोदी की ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है। नुक्कड़ पर चाय की दुकान पर चाय पीता रिक्शा चालक या कॉलेज में पढ़ने वाला कोई बालक ,पान की दुकान पर धुंए के छलै बनाता कोई दिलजला आशिक या फिर कोई दार्शनिक ,बस में सफर करते दो अनजान यात्री हों या फिर किसी वातानुकूलित कमरे में बैठे दो घनिष्ठ मित्र ,दफ्तरों में काम करते बाबू या फिर एकांत में चिलम पीते साधू ,क्या दुकानदार ,हवालदार ,जैलदार या फिर कोई पहरेदार सभी के मुख पर बस एक ही बात है, "ये मोदी ज़रूर कुछ करेगा।"टीवी पर बेशक प्रचार प्रसार रुक गया हो लेकिन अब आम आदमी के ओंठों पर बस एक ही गीत है , "अच्छे दिन आने वाले हैं !"
शुभकामनायें !
लो जी विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र हिंदुस्तान की राजनीति में विश्व रिकॉर्ड बन गया है। स्वतन्त्र देश में जन्म लेने वाला पहला व्यक्ति २६ मई को विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहा है।पिछले करीब 65 साल से देश की सत्ता पर काबिज कांग्रेस की ये सब से बढ़ी हार हुई है।
नरेंद्र मोदी द्वारा लोकसभा के सेंट्रल हॉल में दिए गए भाषण को सुन रहा था। वाह जी वाह मोदी जी !आप तो छा गए। कमाल का भाषण दिया। तालियां बजीं ,आंसू बहे ,माँ को याद किया गया। अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की फिल्म का डायलाग याद आ गया , "मेरे पास माँ है। " टीवी वाले अलग -अलग ढंग से आप के भाषण को बार -बार दिखा रहे हैं। दिखाएँ भी क्यों ना.……टी आर पी का चक्कर जो है।
यही नहीं संसद में प्रवेश से पहले जिस तरहां से नतमस्तक हो कर सलाम किया गया वो सच में काबीले तारीफ़ है।आडवाणी और वाजपायी को जिस तरह से सम्मान दिया गया उस से भारतीय संस्कृति को बखूबी प्रचारित और प्रसारित करने में आप कामयाब हुए हैं।
ये बाल धुप में सफ़ेद नहीं किए हैँ ,इस लकोक्ति के मायने समझ आने लगे हैं। समझ में आने लगा है के किला फ़तेह करने के लिए कला और कौशल दोनों की ज़रुरत होती है।जोकि मोदी ने बखूबी किया है। पूरा देश मोदीमय हो गया है। मोदी के बोलने के स्टाइल की वाजपाई के साथ तुलना की जा रही है।
आशावाद ,देशभक्ति ,महिलाओं की सुरक्षा ,गरीबों के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए जिस तरह मोदी ने संसद में बैठे जनप्रतिनिधिओं को सरकार के मायने बताए वो निःसंदेह सराहनीय है।सरकार का मतलब है लोगों की सरकार ,जो लोगों के बारे में सोचे और जो लोगों के सपने ले। वाह जी वाह मोदी जी। आपने संसद में अपने पहले भाषण से अपने साथिओं को जो संकेत दिए हैं ,मैं उस की मुक्त कंठ से प्रसंशा करता हूँ। राह आसान नहीं है परन्तु यदि होंसले बुलंद हों और नियत में कोई खोट न हो तो मंज़िल नज़दीक नज़र आने लगती है।
मोदी को हिंदुस्तान की जनता ने जिस तरह से बहुमत दिया है उससे मोदी की ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है। नुक्कड़ पर चाय की दुकान पर चाय पीता रिक्शा चालक या कॉलेज में पढ़ने वाला कोई बालक ,पान की दुकान पर धुंए के छलै बनाता कोई दिलजला आशिक या फिर कोई दार्शनिक ,बस में सफर करते दो अनजान यात्री हों या फिर किसी वातानुकूलित कमरे में बैठे दो घनिष्ठ मित्र ,दफ्तरों में काम करते बाबू या फिर एकांत में चिलम पीते साधू ,क्या दुकानदार ,हवालदार ,जैलदार या फिर कोई पहरेदार सभी के मुख पर बस एक ही बात है, "ये मोदी ज़रूर कुछ करेगा।"टीवी पर बेशक प्रचार प्रसार रुक गया हो लेकिन अब आम आदमी के ओंठों पर बस एक ही गीत है , "अच्छे दिन आने वाले हैं !"
शुभकामनायें !
Monday, 7 April 2014
A LETTER......EK CHITHEE PART-13
दोस्तों ,
कुछ दिन पहले ही अमेरिका से पारिवारिक मित्र मंजीत चीमा का फ़ोन आया था के वो हिंदुस्तान आ रहे हैं। अब तक दिल्ली पहुँच गए होंगे ।अभी तक उनसे सम्पर्क नहीं हो पाया है। 8 या 9 अप्रैल को उनका हमारे यहाँ आने का कार्यक्रम है। आ जाओ जी ! हम आप का बेसब्री से इन्तज़ार कर रहे हैं।
स्कूल में 31 मार्च को 2013 -14 सेशन का अंतिम दिन था। नए सेशन में बच्चों को अपना 100 %अनुभव और ज्ञान देने का संकल्प स्टाफ मीटिंग में लिया गया। ताकि बच्चे जीवन के इम्तहान में पास हो सकें। पिछले सेशंन में कुछ नए साथी अध्यापकों ने ज्वाइन किया और कुछ साथ छोड़ गए। पिछले 7 -8 साल से काम करते करते स्कूल अपना सा लगने लगा है। सभी साथी अध्यापक एक टीम की तरह काम करने लगे हैं। पुराने अध्यापकों में पूनम ,संगीता ,पूजा नगवाल ,संतोष ,मंजू और निर्मला ने विशेषतः काफी इम्प्रूव किया है। यही नहीं रेनू ,सुनीता भंडारी और नवज्योत में कमाल का बदलाव आया है। पूरी ज़िम्मेदारी से काम करने के लिए ये सब एक मिसाल बन चुकी हैं। कुछ बच्चे स्कूल छोड़ कर जाने वाले हैं और नए बच्चों का दाखिला भी शुरू हो चुका है।
1 अप्रैल को सुखमणी साब के पाठ और सरस्वती पूजन के साथ नए सेशन की शुरुआत की गई। पहले दिन कुल १३९ बच्चे स्कूल में आए। लोगों के दिमाग में ये रहता है के शुरुआत में पढ़ाई नहीं होती। बच्चों को नाना -नानी ,मामा -मामी या किसी और रिश्तेदार के घर छोड़ आते हैं। बाद में स्कूलों पर दोष मढ़ दिया जाता है के स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती।इंग्लिश मीडियम में बच्चों को पढ़ाने की ललक कमाल की है। समझ नहीं आता के बच्चों के भविषय का क्या होगा।घर में कोई भी सदस्य पढ़ा न होने के बावजूद माँ -बाप बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ाने का कोई ठोस जवाब नहीं दे पाते। कुछ समय के बाद जब बच्चे को इंग्लिश समझ नहीं आती और घर पर कोई पढ़ाने या समझाने वाला भी नहीं होता। जब तक माँ -बाप को इस बात की समझ आती है तब तक काफी देर हो चुकी होती है।मेरा ये मानना है के शिक्षा प्रणाली में घोर परिवर्तन की ज़रुरत है। शिक्षा पद्धति में मूलभूत परिवर्तन के साथ -साथ शिक्षा को तकनीकी और प्रायोगिक बनाना होगा। अन्यथा बच्चों के भविषय का "रब्ब राखा" है।
जीवन में पहली बार अप्रैल के महीने में ढंडक को महसूस कर के आश्चर्य के साथ -साथ चिंता भी हो रही है।आज भी बारिश हुई। कश्मीर में लगातार २४ घंटे बारिश से सभी हैरान हैं। कहीं ये ग्लोबल वार्मिंग की दस्तक तो नहीं ! अमेरिका में इस बार _60 डिग्री तापमान से भी पर्यावरणविद चिंतित हैं। भूपंक और समुद्री तूफ़ान तो अब आम हो गए हैं।
एक और साथी "विक्की" मोह माया भरी दुनिया को अलविदा कह प्रभु चरणों में लीन हो गया।स्कूलों में पुस्तकें सप्लाई का स्थापित काम था। एक लम्बे अर्से से ज़िंदगी और मौत की जंग में जूझ रहा
"विक्की" अंततः मौत से जीत नहीं पाया। उसके घनिष्ठ मित्रों का कहना है के शराब बहुत पीता था।
७ अप्रैल को भारत के आम चुनावों के प्रथम चरण का मतदान हो चुका है। टी वी और अख़बारों के अलावा कहीं भी चुनावी रंग नज़र नहीं आ रहा। पिछले चुनावों के मुकाबले शोर शराबा और पोस्टरबाजी बहुत कम है। इस बार लोग मोदी की लहर का ज़िक्र आम कर रहे हैं। आम पार्टी का ज़िक्र खास नहीं रहा है। कांग्रेस के साथ पर लोग अपने पाँव के साथ साथ अपना हाथ भी पीछे खींच रहे हैं। देखना ये है के ऊंट किस करवट बैठता है।
मेरी से गुजारिश है के आप अपने वोट को व्यर्थ न जाने दें। वोट ज़रूर डालें और सोच समझ कर !
अच्छा दोस्तों फिर मिलते हैं। मेरी ओर से आप सब को ढेर सारी शुभकामनाएँ।
To be continued..................
समझ नहीं आ रहा के ख़त की शुरुआत कहाँ से करूँ। घर में थोड़ा मरमत्त का काम था। ऐसी शुरूआत हुई के आटे दाल का भाव पता लग गया। हर चीज़ के भाव आसमां छू रहे हैं। मुझे तो बशीर बद्र साब का ये शेर याद आ रहा है ," लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में ,तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।" हालाँकि ये शेर किसी और सन्दर्भ में लिखा गया है। थोडा सा काम करवाना था पर सारे घर में तोड़ फोड़ हो चुकी है।
15 दिन तो हो चुके हैं और कितने दिन लगेंगे इस का अंदाज़ लगाना मुश्किल है।
मेरे घर के आसपास बहुत सारे घरों को पूरी तरह गिरा कर नया बनाया जा रहा है। जिस तरह से काम चल रहा है ,उससे साफ़ है के लाखों खर्च होंगे। यहाँ तो दो ईंट लगाने में सांस फूल गए ! आश्चर्य होता है के इन लोगों के पास इतना पैसा कहाँ से आता है। लगता है इन लोगों की लॉटरी लगी है या कोई गढ़ा खजाना हाथ और या फिर कुछ गोल माल है।15 दिन तो हो चुके हैं और कितने दिन लगेंगे इस का अंदाज़ लगाना मुश्किल है।
कुछ दिन पहले ही अमेरिका से पारिवारिक मित्र मंजीत चीमा का फ़ोन आया था के वो हिंदुस्तान आ रहे हैं। अब तक दिल्ली पहुँच गए होंगे ।अभी तक उनसे सम्पर्क नहीं हो पाया है। 8 या 9 अप्रैल को उनका हमारे यहाँ आने का कार्यक्रम है। आ जाओ जी ! हम आप का बेसब्री से इन्तज़ार कर रहे हैं।
स्कूल में 31 मार्च को 2013 -14 सेशन का अंतिम दिन था। नए सेशन में बच्चों को अपना 100 %अनुभव और ज्ञान देने का संकल्प स्टाफ मीटिंग में लिया गया। ताकि बच्चे जीवन के इम्तहान में पास हो सकें। पिछले सेशंन में कुछ नए साथी अध्यापकों ने ज्वाइन किया और कुछ साथ छोड़ गए। पिछले 7 -8 साल से काम करते करते स्कूल अपना सा लगने लगा है। सभी साथी अध्यापक एक टीम की तरह काम करने लगे हैं। पुराने अध्यापकों में पूनम ,संगीता ,पूजा नगवाल ,संतोष ,मंजू और निर्मला ने विशेषतः काफी इम्प्रूव किया है। यही नहीं रेनू ,सुनीता भंडारी और नवज्योत में कमाल का बदलाव आया है। पूरी ज़िम्मेदारी से काम करने के लिए ये सब एक मिसाल बन चुकी हैं। कुछ बच्चे स्कूल छोड़ कर जाने वाले हैं और नए बच्चों का दाखिला भी शुरू हो चुका है।
1 अप्रैल को सुखमणी साब के पाठ और सरस्वती पूजन के साथ नए सेशन की शुरुआत की गई। पहले दिन कुल १३९ बच्चे स्कूल में आए। लोगों के दिमाग में ये रहता है के शुरुआत में पढ़ाई नहीं होती। बच्चों को नाना -नानी ,मामा -मामी या किसी और रिश्तेदार के घर छोड़ आते हैं। बाद में स्कूलों पर दोष मढ़ दिया जाता है के स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती।इंग्लिश मीडियम में बच्चों को पढ़ाने की ललक कमाल की है। समझ नहीं आता के बच्चों के भविषय का क्या होगा।घर में कोई भी सदस्य पढ़ा न होने के बावजूद माँ -बाप बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ाने का कोई ठोस जवाब नहीं दे पाते। कुछ समय के बाद जब बच्चे को इंग्लिश समझ नहीं आती और घर पर कोई पढ़ाने या समझाने वाला भी नहीं होता। जब तक माँ -बाप को इस बात की समझ आती है तब तक काफी देर हो चुकी होती है।मेरा ये मानना है के शिक्षा प्रणाली में घोर परिवर्तन की ज़रुरत है। शिक्षा पद्धति में मूलभूत परिवर्तन के साथ -साथ शिक्षा को तकनीकी और प्रायोगिक बनाना होगा। अन्यथा बच्चों के भविषय का "रब्ब राखा" है।
जीवन में पहली बार अप्रैल के महीने में ढंडक को महसूस कर के आश्चर्य के साथ -साथ चिंता भी हो रही है।आज भी बारिश हुई। कश्मीर में लगातार २४ घंटे बारिश से सभी हैरान हैं। कहीं ये ग्लोबल वार्मिंग की दस्तक तो नहीं ! अमेरिका में इस बार _60 डिग्री तापमान से भी पर्यावरणविद चिंतित हैं। भूपंक और समुद्री तूफ़ान तो अब आम हो गए हैं।
एक और साथी "विक्की" मोह माया भरी दुनिया को अलविदा कह प्रभु चरणों में लीन हो गया।स्कूलों में पुस्तकें सप्लाई का स्थापित काम था। एक लम्बे अर्से से ज़िंदगी और मौत की जंग में जूझ रहा
"विक्की" अंततः मौत से जीत नहीं पाया। उसके घनिष्ठ मित्रों का कहना है के शराब बहुत पीता था।
७ अप्रैल को भारत के आम चुनावों के प्रथम चरण का मतदान हो चुका है। टी वी और अख़बारों के अलावा कहीं भी चुनावी रंग नज़र नहीं आ रहा। पिछले चुनावों के मुकाबले शोर शराबा और पोस्टरबाजी बहुत कम है। इस बार लोग मोदी की लहर का ज़िक्र आम कर रहे हैं। आम पार्टी का ज़िक्र खास नहीं रहा है। कांग्रेस के साथ पर लोग अपने पाँव के साथ साथ अपना हाथ भी पीछे खींच रहे हैं। देखना ये है के ऊंट किस करवट बैठता है।
मेरी से गुजारिश है के आप अपने वोट को व्यर्थ न जाने दें। वोट ज़रूर डालें और सोच समझ कर !
अच्छा दोस्तों फिर मिलते हैं। मेरी ओर से आप सब को ढेर सारी शुभकामनाएँ।
To be continued..................
Wednesday, 19 March 2014
A LETTER...... EK CHITHEE PART-12
राम राम ,सतश्रीअकाल , सलाम वालेकुम या फिर जय हिन्द।
आप को जो भी अच्छा लगे मेरी ओर से स्वीकार करें। इलेक्शन के दिन हैं पता नहीं किस को क्या अच्छा लगे क्या बुरा। कौन दुश्मन हो जाए कौन दोस्त। वो कहते हैं न के ,"प्यार और जंग में सब जायज़ है। " लेकिन अब जिस तरह की राजनीति चल रही है उस से तो ये साफ़ हो गया है के ,"राजनीति में सब जायज़ है।"
पहले तालमेल की राजनीति होती थी अब ससुरी घालमेल की हो गई है।राजनीतिज्ञों ने अपने चेहरे इस तरह से पोते हुए हैं के इन के चेहरों के हाव -भाव और भीतर घात का कुछ पता ही नहीं चलता।ऐसा चक्रव्हयू रचते हैं के आम आदमी इनके जाल में फंस ही जाता है। एक समय ऐसा आता है जब वो खुद को नपुंसक समझने लगता है।
बे पेंदी के लोटे की तरह कभी इस डगर तो कभी उस डगर। नेताओं को तो जैसे मान मर्यादा से कुछ लेना देना न हो। जिस के साथ सालों साल इकट्ठे गुज़ारे हों वही पल भर में दुश्मन हो जाता है। असल में मौकापरस्ती की राजनीति हो गई है।
धर्म निरपेक्षता का राग अलापने वाली पार्टियां लोगों के बीच धर्म ,जाति ,रंग का ऐसा ज़हर घोलती हैं के एक हाथ दूसरे हाथ से कब और किस तरह अलग हो जाता है लोगों को पता ही नहीं चलता। राम झूठ न बुलवाए राजनीति बच्चों का खेल नहीं है। ये तो सच में सिध्हस्त लोगों का ही काम है।
होली के बाद देश की जनता चुनावी रंग में रंगी जा रही है। नेता अपने चुनावी भाषणों में वायदों की पिचकारी से जनता को सम्मोहित करने लगे हैं। गरीबी ,भ्रष्टाचार ,बेरोज़गारी ,महंगाई ,कानून वय्वस्था ,शिक्षा ,स्वास्थ ,बच्चों -महिलाओं ,मज़दूरों किसानों और आम आदमी की समस्या से इन को कुछ लेना -देना नहीं। ये सब तो इन के अस्त्र -शस्त्र हैं। जब जिस की ज़रुरत हुई उसको इस्तमाल कर लिया।कभी ये पार्टी तो कभी वो पार्टी।
दोस्तों समझना होगा के वोटर उपभोग या उपयोग की वस्तु नहीं बल्कि अपना और अपने देश का भाग्य विधाता है। हमें अपनी मह्ता को समझना होगा और बहुत सोच समझ कर मतदान करना होगा ताकि इन चुनावों के बाद एक बार फिर हम अपने को ठगा हुआ महसूस न करें।
जयहिंद !
आप को जो भी अच्छा लगे मेरी ओर से स्वीकार करें। इलेक्शन के दिन हैं पता नहीं किस को क्या अच्छा लगे क्या बुरा। कौन दुश्मन हो जाए कौन दोस्त। वो कहते हैं न के ,"प्यार और जंग में सब जायज़ है। " लेकिन अब जिस तरह की राजनीति चल रही है उस से तो ये साफ़ हो गया है के ,"राजनीति में सब जायज़ है।"
पहले तालमेल की राजनीति होती थी अब ससुरी घालमेल की हो गई है।राजनीतिज्ञों ने अपने चेहरे इस तरह से पोते हुए हैं के इन के चेहरों के हाव -भाव और भीतर घात का कुछ पता ही नहीं चलता।ऐसा चक्रव्हयू रचते हैं के आम आदमी इनके जाल में फंस ही जाता है। एक समय ऐसा आता है जब वो खुद को नपुंसक समझने लगता है।
बे पेंदी के लोटे की तरह कभी इस डगर तो कभी उस डगर। नेताओं को तो जैसे मान मर्यादा से कुछ लेना देना न हो। जिस के साथ सालों साल इकट्ठे गुज़ारे हों वही पल भर में दुश्मन हो जाता है। असल में मौकापरस्ती की राजनीति हो गई है।
धर्म निरपेक्षता का राग अलापने वाली पार्टियां लोगों के बीच धर्म ,जाति ,रंग का ऐसा ज़हर घोलती हैं के एक हाथ दूसरे हाथ से कब और किस तरह अलग हो जाता है लोगों को पता ही नहीं चलता। राम झूठ न बुलवाए राजनीति बच्चों का खेल नहीं है। ये तो सच में सिध्हस्त लोगों का ही काम है।
होली के बाद देश की जनता चुनावी रंग में रंगी जा रही है। नेता अपने चुनावी भाषणों में वायदों की पिचकारी से जनता को सम्मोहित करने लगे हैं। गरीबी ,भ्रष्टाचार ,बेरोज़गारी ,महंगाई ,कानून वय्वस्था ,शिक्षा ,स्वास्थ ,बच्चों -महिलाओं ,मज़दूरों किसानों और आम आदमी की समस्या से इन को कुछ लेना -देना नहीं। ये सब तो इन के अस्त्र -शस्त्र हैं। जब जिस की ज़रुरत हुई उसको इस्तमाल कर लिया।कभी ये पार्टी तो कभी वो पार्टी।
दोस्तों समझना होगा के वोटर उपभोग या उपयोग की वस्तु नहीं बल्कि अपना और अपने देश का भाग्य विधाता है। हमें अपनी मह्ता को समझना होगा और बहुत सोच समझ कर मतदान करना होगा ताकि इन चुनावों के बाद एक बार फिर हम अपने को ठगा हुआ महसूस न करें।
जयहिंद !
Subscribe to:
Posts (Atom)





