" मियां मकबूल "
मियां मकबूल खुशदिल व्यक्ति थे। मिजाज़ ऐसा की हर आदमी उनकी तरफ खींचा चला आता । चेहरा उनका हमेशा खिला रहता। उन्हें फोटोग्राफी का बहुत शौंक था। अपने किस्सों में वो अक्सर फोटोग्राफी का ज़िक्र करते। एक दिन उन्हें न जाने क्या हुआ कि वो अपने दिमाग का संतुलन खो बैठे। शुरू में तो मियां मकबूल कुछ बहकी बहकी बातें करते थे। परिवार के लोगों ने समझा कि मस्ती में रहते हैं इसलिए ऐसा करने लगे हैं। मगर धीरे धीरे वो उलूल जुलूल बातें करने लगे । मियां कभी गीत गाने लगते तो कभी किसी हीरो या विलियन की तरह डायलॉग बोलने लगते। सब लोग उनकी इन हरकतों से हैरान परेशान थे। किसी को भी ये समझ नहीं आया कि आखिर मियां को हुआ क्या है। उनकी बेगम हसीना भी मियां मकबूल के इस तरह के बर्ताव से सकते में थी। हसीना मियां मकबूल से बहुत प्रेम करती थी। वो ख़ुदा से मुखातिब हो बातचीत करते हुए कहती, " या अल्लाह ! ऐसा कौन सा गुनाह किया था जिस की सज़ा मियां को मिल रही है।" घर के लोग अब मियां मकबूल का विशेष ध्यान रखने लगे थे । वो इस बात से सब्र कर लेते कि कई बार मियां को पुरानी बातें याद आ जाती और बिल्कुल सही तरीके से बर्ताव करने लगते।
ख़ैर जब कभी भी वो ठीक होते अपने पुराने दिनों को वो याद करते हुए बताते कि अपने खिलौनों में भी वो कैमेरा ही खरीदते थे। जैसे जैसे बड़े हुए कहीं न कहीं से जुगाड़ कर के कोई नया पुराना कैमरा खरीद लाते। वो बताते की कलर्ड कैमरे का ज़माना नहीं था। ब्लैक एंड व्हाइट कैमरे से ही फोटो खींची जाती थी। बाद में कुछ एक्सपर्ट फोटो ग्राफर उनमें रंग भर दिया करते।
मियां मकबूल अपने दोस्तों को अपनी पुरानी फोटो दिखा कर बहुत खुश होते । वो अपनी पुरानी यादों को समेटते हुए बताते कि किस तरह एक कोडक कंपनी के कैमरे के लिए वो रील का जुगाड़ करते और फिर उसको धुलवा कर नेगेटिव बनवाते और फिर कुछ चुनिंदा फोटो बनवाते। " भले ज़माने की बात बता रहा हूं, बहुत महंगी होती थीं फोटो ग्राफी! कई कई महीने चलती थी कैमरे की फिल्म! कैमरे का ध्यान तो रखना ही होता था, साथ में इस बात का भी विशेष ध्यान रखना होता कि कहीं कोई कैमरे का शटर न खोल दे। शटर खुला नहीं ,सारी फोटो सफा चट्ट।" ये बताते हुए मकबूल के चेहरे पर चिंता के भाव झलकने लगते। अपने को संभालते हुए वो आगे बताते कि उनके साथ ऐसा कई बार हुआ है। कोई न कोई गलती से शटर का बटन दबा देता और सारी फोटो उड़न छू!
मियां मकबूल को इस बात का बहुत शिकवा था कि वो चाहते हुए भी कोई बढ़िया कैमरा न खरीद सके। बढ़िया से मतलब कोई प्रोफेशनल कैमरा। समय के साथ साथ ज़िम्मेदारियां बढ़ती रही, कमाई का कोई बढ़िया ज़रिया नहीं था, छोटी - मोटी नौकरी करते रहे उम्रभर, थोड़ा बहुत जो कमाते घर का गुज़र- बसर हो जाता। अपने प्रोफेशनल कैमरे को न ले पाने का कारण वो कुछ इस तरह बताते।
बच्चे बढ़े हो चुके थे, उनका बेटा करीम दिल्ली में नौकरी करने के लिए चला गया था। उसे घर से गए चार महीने हो गए थे। हालांकि मलेरकोटला से दिल्ली कोई ज़्यादा दूर नहीं था, बस पांच छह घंटे का ही तो सफ़र था। हां मियां को इस बात से तस्सली थी कि करीम बीच बीच में अपने अब्बा से बात कर लिया करता था।
मियां मकबूल आज ख़ुश नज़र आ रहे थे। वो अपनी खुंडी को घुमाते हुए बरामदे में इधर उधर टहल रहे थे। मानो उन्हें चलने के लिए खुंडी की ज़रूरत ही न हो। जैसे खुंडी तो वो अपने साथ में बस यूं ही रौब रूबाब के लिए रखते हों। बाज़ार से वो फल फ्रूट पहले ही खरीद लाए थे। बरामदे में टहलते हुए वो अपनी बेगम को बार बार आवाज़ लगा कर पूछते कि करीम का कोई फोन आया क्या ? कहां पहुंचा है वो? बेगम चौके में मशगूल थी। मियां के एक ही सवाल का बार बार जवाब देकर वो परेशान हो चुकी थी। हां ! बस पहुंचने ही वाला होगा। हसीना चूल्हे में फूंक मारते हुए बोलती ।
मियां मकबूल का बरामदे में घूमने का सिलसिला बदस्तूर जारी था। आखिर जिस का इंतज़ार था वो घड़ी भी आ ही गई। करीम ने घर में प्रवेश किया। करीम ने अपने वालिद से दुआ सलाम की और अपनी अम्मा को मिलने के लिए वो रसोई की तरफ बढ़ गया। मियां अपने बेटे को रसोई की तरफ जाते हुए निहारते रहे और कोई देख न ले कुछ इस तरह वो अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए बोले," बेगम ! संभालो अपने लाल को, हर पल इसी के बारे में सोचती रहती थी न! अब करो जो इस की खिदमत करनी है !" ये कहते हुए मियां घर से बाहर निकल लिए।
मियां मकबूल जब कुछ देर बाद घर वापिस लौटे तो हसीना और करीम बातों में मशगूल थे। अपने बेटे के लिए बनाए गाजर के हलवे को हसीना अपने हाथों से खिला रही थी। मियां ने अपनी बेगम की ओर इशारा करते हुए कहा," कभी हमें भी इस तरह खिला दिया करो बेगम के रूह को सकूं मिले।" ये सुनते ही बेगम ने गाजर के हलवे का एक चम्मच मियां की ओर बढ़ा दिया।
सर्दियों के दिन थे। मां बेटा रजाई में बैठे थे। मियां ने भी साथ रखी एक और रजाई में अपने पांव घुसेड़ दिए , अपने बेटे की तरफ मुखातिब होते हुए वो बोले," और सुनाओ मियां क्या खबर ? " सब अल्लाह का शुक्र है अब्बा !" करीम ने जवाब दिया। करीम ने अपनी अम्मी की तरफ शरारत भरी नज़रों से देखते हुए अपनी रजाई में से एक डिब्बा निकाल कर अपने अब्बा की ओर बढ़ा दिया। अब्बा ने डिब्बे कस कर पकड़ लिया और हसीना की ओर इस तरह देखा मानो पूछ रहे हों कि तुम तो जानती हो कि आखिर इस में है क्या ! हसीना अपने पति के हावभाव को देखकर मंद मंद मुस्करा रही थी।
मियां मकबूल को समझ नहीं आ रहा था। करीम से उन्होंने पूछते हुए कि डिब्बे में क्या है,झटपट डिब्बे के ऊपर चढ़ा हुआ चमकीला कागज़ उतारना शुरू कर दिया। जैसे जैसे चमकीला कागज़ उतर रहा था उनके चेहरे पर रंगत बढ़ती हा रही थी और मियां मकबूल के दिल की धड़कन तेज़ होती जा रही थी । उनके चेहरे पर खुशी के भाव साफ देखे जा सकते थे। जैसे ही मियां ने डिब्बा खोला उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने अपने बेटे को अपने आगोश में भर लिया और उसे चूमने लगे। वो अपने बेटे की ओर प्यार भरी नज़रों से देखते हुए बोले," ख़ुदा का शुक्र है कि मेरे बेटे ने मेरी बरसों पुरानी मुराद पूरी कर दी। डिब्बे में एक प्रोफेशनल कैमरा देख कर मियां मकबूल की आंखे भर आई। करीम और हसीना मियां को मुस्कुराते हुए निहार रहे थे । कैमरे को इधर उधर घुमाते हुए मियां मकबूल के चेहरे के भाव रंग बदलने लगे थे। वो कैमरे को एक तरफ रखते हुए बोले," कितने का है? बहुत महंगा होगा ?" करीम अपने अब्बा के मन की बात को समझ गया और तुरंत बोला, " आप क्या लेते हो अब्बा! ये बताइए कैमरा अच्छा है न !" आप के पचासवें जन्मदिन का तोहफा है ये। कुछ दिन पहले ही मियां ने अपना पचासवां जन्मदिन मनाया था और करीम उसमें शरीक नहीं हो पाया था। मियां मकबूल ने फिर से कैमरे को उठा लिया और बोले अब ये तो बताओ कैसे चलेगा। करीम अपने अब्बा को कैमरा ऑपरेट करने का तरीका बताने लगा।
मियां मकबूल की खुशी का कोई ठीकाना न रहा। अब तो मियां हर वक्त कैमरा अपने साथ रखते, मानो अंधे को आंखें मिल गई हों। क्या घर - क्या बाहर वो कैमरा अपने साथ रखते और फोटो क्लिक करने का कोई मौका न चूकते। कहीं बाहर जाते तो कैमरा अपने साथ रखना कतई न भूलते। अपने दोस्त सलीम को फोन करके अपने साथ शहर के बाहर बनी झील पर जाने का आग्रह करते और सलीम और मकबूल दोनों वहां कई कई घंटे बैठे रहते और फोटो शूट चलता रहता। कैमरा डिजिटल था, कुछ ही दिनों में मियां मकबूल ने हज़ारों फोटो खींच डाली। मियां मकबूल तो सारी दुनिया की खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहते थे। मियां अपनी खुंडी को छोड़ कैमरे को अपने साथ रखने लगे। जहां भी कुछ अच्छा दिखाई देता तुरंत फोटो क्लिक कर लेते।
समय बीतता गया और मियां मकबूल के पास खेत - खलियानों , पेड़ - पौधों, बरसात, पक्षियों - जानवरों, बच्चों , औरतों - पुरुषों, इमारतों, बादलों सूरज - चंदा , लोगों के भाव, उनकी भंगिमाएं और न जाने क्या - क्या! सब कुछ उनके कैमरे में कैद था।
मियां कई बार तो किसी पार्क में जा बैठते और किसी ख़ास पल को कैद करने के लिए घंटों वहीं डेरा जमाए रहते। समय बीतता गया और मियां मकबूल का फोटो खींचने का जुनून बढ़ता चला गया। मियां के दोस्त सलीम अपने दोस्त के इस जुनून से कई बार खिज भी जाते । एक बार दोनों शाम की सैर के लिए निकले तो मियां मकबूल अपने साथ कैमरा भी ले लिए। सैर के बाद कुछ देर आराम के लिए बैठे तो मकबूल ने अपना कैमरा खोल लिया। सामने से पांच - सात महिलाओं का एक ग्रुप ज़ोर ज़ोर से चहकते हुए आता हुआ दिखाई दिया। सभी औरतों ने चटक रंग के कपड़े डाले हुए थे। उनके ठहाके और चटक रंग के कपड़े किसी रंग बिरंगे आसमान में बादलों की गर्जन का अहसास करवा रहे थे। मियां मकबूल ने झट से कैमरे को ऑटो mode पर डाला और लगे टकाटक फोटो खींचने। वो तब तक क्लिक करते रहे जब तक औरतों का झुंड उनकी आंखों से ओझल नहीं हो गया। मकबूल फोटो खींच कर जब सलीम को फोटो दिखाने लगे तो सलीम मियां फोटो को बड़े चाव से देखते हुए मज़ाक भरे लहज़े से बोले ," मियां कुछ अपनी उम्र का भी लिहाज़ करो ! कभी किसी के हत्थे चढ़ गए तो लेने के देने पड़ जाएंगे।" मियां तो ठहरे मियां वो कहां किसी की सुनने वाले थे। वो अपनी खिचड़ी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहने लगे, " अब फोटो खींचने के लिए किसी की परमिशन लेने की ज़रूरत पड़ेगी क्या ? "
समय बीतता गया और मियां मकबूल का फोटोग्राफी का शौंक भी परवान चढ़ता गया। एक दिन मौसम का मिजाज़ खुशनुमा था। उनकी बेगम मियां को बोली, "जाइए मार्केट से बेसन पकड़ लाइए। आप को पकोड़े बना देती हूं।" मियां तुरंत चल दिए । साथ में कैमरा भी उठा लिया। सोचा कि कुछ अच्छा मिला तो लगे हाथ दो - चार फोटो भी खींच लाएंगे। बेगम ने जब मियां के हाथ में कैमरा देखा तो वो भड़कते हुए बोली," अब ये मुआं कैमरा क्यों उठा लिया साथ में ? सीधे घर चले आना, कहीं कढ़ाई में तेल जलता रहे और मियां वहां फोटो ग्राफी करते रहें।" यह कह कर हसीना बुढ़बुढाने लगी। मियां ने भी "ठीक है, ठीक है।" कह कर बाहर की ओर रवानगी डाल दी। ख़ुदा की नज़रे इनायत देखिए जैसे ही मियां घर से बाहर निकले बूंदा बांदी होने लगी। मियां अपना कैमरा बचाते हुए मार्केट पहुंच गए। जब तक मियां किरयाने की दुकान पर पहुंचे मौसम अपने पूरे शबाब पर पहुंच चुका था। मार्च के महीने में सावन जैसे महीने की रंगत ने मियां का दिल बाग बाग कर दिया। किरयाने की दुकान पर लाला का बेटा अपनी दुकान छोड़ कर अपने मोबाइल से शबाब से भरे हसीं मौसम में आसपास के दृश्यों को कैद करने में मशगूल था। मियां को देखते ही लाला का बेटा खुशी भरे लहज़े में मियां से बोला," देखो चच्चा जान, ख़ुदा का नूर उतर आया है चारों ओर।" लाला का बेटा मियां के फोटोग्राफी के शौंक से बख़ूबी वाकिफ था और वो अपने द्वारा खींची फोटो मियां को दिखाने लगा। मियां में तो लाला के बेटे ने जैसे गुब्बारे में हवा भरने का काम कर दिया। मियां ने तुरंत अपने बैग में से कैमरा निकालते हुए कहा," फोटोग्राफी क्या होती है ये हम अभी तुम्हें बताते हैं।" चारों ओर लोग अपने मोबाइल निकाल कर धड़ाधड़ फोटो खींचते हुए दिखाई देने लगे। ख़ुदा का नूर देखिए जैसे ही मियां ने अपने कैमरे में बड़ा सा लेंस फिट किया, फिज़ा का रंग अपने पूरे शबाब पर था। ढलते हुए सूरज की रोशनी को बादल ढकने की कौशिश कर रहे थे और ढलते सूरज ने एक ख़ास चमक के साथ सभी चीज़ों को सोने जैसे रंग में रंग दिया। आसमान पर rainbow ( सप्तरंगी इन्द्रधनुष ) ने तो जैसे चार चांद लगा दिए। सभी इस विहंगम दृश्य को देखकर खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। मियां के हाथों की अंगुलियों में जैसे रक्त तेज़ी से घूमने लगा था। उन्होंने ने झटपट अपना चश्मा उतारा और अपने कैमरे को चारों तरफ घुमा कर टकाटक क्लिक करने लगे। कहीं आसमां को निहारते युवा युवतियां तो कहीं इन्द्रधनुष को निहारते नन्हें नन्हें बच्चे। एक तरफ किलकारियां मारती युवतियां तो दूसरी तरफ इन्द्रधनुष को अपने मोबाइल में कैद करते अलग - अलग लोग। मियां मन ही मन फूले नहीं समा रहे थे। कुछ लोग मियां को भी क्लिक कर रहे थे। उनके हाथ में प्रोफेशनल कैमरा जो था। मियां मकबूल इस पूरे दृश्य में अपने प्रोफेशनल कैमरा की वजह से सबके आकर्षण का केंद्र बिंदु बने हुए थे।
कैमरा भी जैसे मियां मकबूल की अंगुलियों पर नृत्य करते हुए अपना काम कर रहा था। मियां की एक आंख कैमरा की आंख में लगी हुई थी। कैमरा इन्द्रधनुष के साथ साथ चारों और घूम रहा था। सहसा मियां क्या देखते हैं कि एक ख़ूबसूरत महिला अपनी चौदह पंद्रह साल की बिटिया के साथ इन्द्रधनुष की फोटो खींचने में व्यस्त थीं। मियां के कैमरे को जैसे किसी ने स्टैचू बोल दिया हो और सारे परिदृश्य को भूलकर मां बेटी की फोटो क्लिक करने में जुट गया । मां बेटी दोनों ने सफेद रंग की शानदार जाकेट पहन रखी थी। कैमरा की स्क्रीन पर ऐसा लग रहा था मानो पहाड़ों से बर्फ की दो सिल्लियां ज़मीन पर उतर आई हों।
जैसे ही मियां मकबूल फोटो खींच कर किरयाने की दुकान की ओर मुड़े तो "excuse me" की आवाज़ सुनकर वो पीछे की ओर मुड़े। मां अपनी बेटी के साथ मियां की तरफ ही आ रही थी। मियां ने अपनी तरफ आते हुए देखा तो वो बड़े अदब से उनकी तरफ मुखातिब होते हुए बोले," फरमाइए ! क्या आप मुझसे कुछ कहना चाह रही हैं ?" बर्फ की सिल्ली की तरह दिखाई देने वाली मोहतरमा का मिजाज़ कुछ बदला हुआ दिखाई दे रहा था। वो मियां से बोली, " क्या आपने हमारा फोटो खींचा है?" "जी देखिए!" मियां ने तुरंत अपने कैमरे की स्क्रीन खोल दी और मां - बेटी को उनकी फोटो दिखाने लगे। मियां मन ही मन इतने ख़ुश थे कि उन्हें ऐसा लगने लगा मानों मां बेटी उनके द्वारा खींची गई फोटो को देख कर ख़ुशी से फूली नहीं समाएंगी। मियां ने भी जब फोटो देखा तो उनके मन में अपनी बेटी यास्मीन और बेगम हसीना के चेहरे उतर आए। एक लंबे अरसे के बाद मियां को लगा की बेजान तस्वीरें भी बोलती हैं।लेकिन ख़ुदा को तो कुछ और ही मंज़ूर था। फोटो देखकर मोहतरमा किसी आग के गोले की तरह दहकते हुए बोली," how you dared to click our photos without our permission?" ( हमारी इजाज़त के बिना आप की हिम्मत कैसे हुई हमारी फोटो खींचने की?") मियां की ख़ुशी को जैसे ग्रहण लग गया। एकदम से विपरीत परिस्थिति का तो जैसे उन्हें कतई अंदेशा ही न था। मियां अपने आप को संभालते हुए बोले, " Madam , It just went randomly. I was clicking as you and I hadn't any intention to specially click your photo." ( "मोहतरमा ! आप की तरह मैं भी फोटो खींच रहा था और आप की फोटो इत्तफाक से क्लिक हो गई।") मियां इस से पहले कि कुछ और बोलते मोहतरमा ने तुरंत अपना पहले वाला प्रश्न दाग दिया," लेकिन आपने हमारी फोटो बिना इजाज़त के कैसे खींची ? इसको तुरंत डिलीट कीजिए ।" इस बार वो अपना गुस्सा हिंदी में उतार रही थी। साथ ही मोहतरमा ने मियां का पूरा बायोडाटा लेना शुरू कर दिया। मियां मकबूल के मन में कुछ बुरा तो था ही नहीं और वो मोहतरमा को अपने बारे में जानकारी देते चले गए। मोहतरमा किसी वूमेन सैल की इंस्पेक्टर की तरह प्रश्न दागे जा रही थी और थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। मियां किसी कटघरे में खड़े अपने आप को किसी मुजरिम की तरह महसूस करने लगे। मियां ने उस मोहतरमा को लाख समझाने की कोशिश की लेकिन महिला तो जैसे बात का बतंगड़ बनाने पर आमदा थी। सभी वो लोग जो इन्द्रधनुष की तस्वीरें खींचने में व्यस्त थे मौके की नज़ाकत को समझने के लिए भीड़ में तब्दील होने लगे। लोगों को जमा होते देख महिला बुलंद आवाज़ में चिल्लाने लगी,"देखिए तो सही इस बूढ़े की हिमाकत ! मां बेटी को अकेला देखकर फोटो खींच रहा था।" भीड़ के बीच में से एक युवा उस महिला का साथ देते हुए बोला, " मियां अपनी सफेदी का तो ख्याल किए होते। हमारे इलाके में होते तो आपको दिखा दिए होते बहू - बेटी की के साथ बद्तमीज़ी करने का सिला। इससे पहले कि मियां कुछ बोल पाते काली का रूप धारण करते हुए वो महिला बोली, " अभी डिलीट करिए हमारी तस्वीरों को।" तू कौन मैं खामखां वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए एक लड़का चिल्लाया, " अरे फोटो क्यों डिलीट करनी हैं, कैमरा ही तोड़ डालो इसका।" अपना डायलॉग बोलने के बाद उस लड़के अपने बालों पर हाथ फेरते हुए जमा भीड़ के ओर इस तरह देखा मानो आज का हीरो वही हो।मौके की नज़ाकत को समझते हुए मियां ने तुरंत फोटो डिलीट करने में ही समझदारी समझी। मियां मकबूल के हाथ कांपने लगे थे, पूरा शरीर पसीने से तर बतर हो चुका था। बमुश्किल डिलीट का बटन दबा पाए और इस पूरे प्रकरण में महिला के चेहरे के भाव जस के तस बने हुए थे।
भीड़ मियां पर अपने अपने ढंग से व्यंग कस रही थी। मियां अपने आप को संभालते हुए लाला की दुकान पर पहुंचे, बेसन खरीदा और घर की ओर रवानगी डाल दी। घर में बेगम को ये किस्सा बताएं या न बताएं ये अभी सोच ही रहे थे कि वो घर की ड्योढ़ी के सामने खड़े थे। मियां को देख हसीना ज़ोर से चिल्लाई, मुए कैमरे ने तो आपको सच में पागल बना दिया है।" यह कहते हुए हसीना मियां के हाथ से बेसन का लिफाफा झटक कर ले गई। मियां तो जैसे ज़मीन में ही दफन हो जाना चाहते थे। वो वहीं खड़े खड़े गुनगुनाने लगे," ये रंग बिरंगी दुनिया,ये सत रंगी दुनिया। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है। ये रंग बिरंगी दुनिया, ये सत रंगी दुनिया ।" समय निकाल कर पढ़ लेना।
मियां मकबूल खुशदिल व्यक्ति थे। मिजाज़ ऐसा की हर आदमी उनकी तरफ खींचा चला आता । चेहरा उनका हमेशा खिला रहता। उन्हें फोटोग्राफी का बहुत शौंक था। अपने किस्सों में वो अक्सर फोटोग्राफी का ज़िक्र करते। एक दिन उन्हें न जाने क्या हुआ कि वो अपने दिमाग का संतुलन खो बैठे। शुरू में तो मियां मकबूल कुछ बहकी बहकी बातें करते थे। परिवार के लोगों ने समझा कि मस्ती में रहते हैं इसलिए ऐसा करने लगे हैं। मगर धीरे धीरे वो उलूल जुलूल बातें करने लगे । मियां कभी गीत गाने लगते तो कभी किसी हीरो या विलियन की तरह डायलॉग बोलने लगते। सब लोग उनकी इन हरकतों से हैरान परेशान थे। किसी को भी ये समझ नहीं आया कि आखिर मियां को हुआ क्या है। उनकी बेगम हसीना भी मियां मकबूल के इस तरह के बर्ताव से सकते में थी। हसीना मियां मकबूल से बहुत प्रेम करती थी। वो ख़ुदा से मुखातिब हो बातचीत करते हुए कहती, " या अल्लाह ! ऐसा कौन सा गुनाह किया था जिस की सज़ा मियां को मिल रही है।" घर के लोग अब मियां मकबूल का विशेष ध्यान रखने लगे थे । वो इस बात से सब्र कर लेते कि कई बार मियां को पुरानी बातें याद आ जाती और बिल्कुल सही तरीके से बर्ताव करने लगते।
ख़ैर जब कभी भी वो ठीक होते अपने पुराने दिनों को वो याद करते हुए बताते कि अपने खिलौनों में भी वो कैमेरा ही खरीदते थे। जैसे जैसे बड़े हुए कहीं न कहीं से जुगाड़ कर के कोई नया पुराना कैमरा खरीद लाते। वो बताते की कलर्ड कैमरे का ज़माना नहीं था। ब्लैक एंड व्हाइट कैमरे से ही फोटो खींची जाती थी। बाद में कुछ एक्सपर्ट फोटो ग्राफर उनमें रंग भर दिया करते।
मियां मकबूल अपने दोस्तों को अपनी पुरानी फोटो दिखा कर बहुत खुश होते । वो अपनी पुरानी यादों को समेटते हुए बताते कि किस तरह एक कोडक कंपनी के कैमरे के लिए वो रील का जुगाड़ करते और फिर उसको धुलवा कर नेगेटिव बनवाते और फिर कुछ चुनिंदा फोटो बनवाते। " भले ज़माने की बात बता रहा हूं, बहुत महंगी होती थीं फोटो ग्राफी! कई कई महीने चलती थी कैमरे की फिल्म! कैमरे का ध्यान तो रखना ही होता था, साथ में इस बात का भी विशेष ध्यान रखना होता कि कहीं कोई कैमरे का शटर न खोल दे। शटर खुला नहीं ,सारी फोटो सफा चट्ट।" ये बताते हुए मकबूल के चेहरे पर चिंता के भाव झलकने लगते। अपने को संभालते हुए वो आगे बताते कि उनके साथ ऐसा कई बार हुआ है। कोई न कोई गलती से शटर का बटन दबा देता और सारी फोटो उड़न छू!
मियां मकबूल को इस बात का बहुत शिकवा था कि वो चाहते हुए भी कोई बढ़िया कैमरा न खरीद सके। बढ़िया से मतलब कोई प्रोफेशनल कैमरा। समय के साथ साथ ज़िम्मेदारियां बढ़ती रही, कमाई का कोई बढ़िया ज़रिया नहीं था, छोटी - मोटी नौकरी करते रहे उम्रभर, थोड़ा बहुत जो कमाते घर का गुज़र- बसर हो जाता। अपने प्रोफेशनल कैमरे को न ले पाने का कारण वो कुछ इस तरह बताते।
बच्चे बढ़े हो चुके थे, उनका बेटा करीम दिल्ली में नौकरी करने के लिए चला गया था। उसे घर से गए चार महीने हो गए थे। हालांकि मलेरकोटला से दिल्ली कोई ज़्यादा दूर नहीं था, बस पांच छह घंटे का ही तो सफ़र था। हां मियां को इस बात से तस्सली थी कि करीम बीच बीच में अपने अब्बा से बात कर लिया करता था।
मियां मकबूल आज ख़ुश नज़र आ रहे थे। वो अपनी खुंडी को घुमाते हुए बरामदे में इधर उधर टहल रहे थे। मानो उन्हें चलने के लिए खुंडी की ज़रूरत ही न हो। जैसे खुंडी तो वो अपने साथ में बस यूं ही रौब रूबाब के लिए रखते हों। बाज़ार से वो फल फ्रूट पहले ही खरीद लाए थे। बरामदे में टहलते हुए वो अपनी बेगम को बार बार आवाज़ लगा कर पूछते कि करीम का कोई फोन आया क्या ? कहां पहुंचा है वो? बेगम चौके में मशगूल थी। मियां के एक ही सवाल का बार बार जवाब देकर वो परेशान हो चुकी थी। हां ! बस पहुंचने ही वाला होगा। हसीना चूल्हे में फूंक मारते हुए बोलती ।
मियां मकबूल का बरामदे में घूमने का सिलसिला बदस्तूर जारी था। आखिर जिस का इंतज़ार था वो घड़ी भी आ ही गई। करीम ने घर में प्रवेश किया। करीम ने अपने वालिद से दुआ सलाम की और अपनी अम्मा को मिलने के लिए वो रसोई की तरफ बढ़ गया। मियां अपने बेटे को रसोई की तरफ जाते हुए निहारते रहे और कोई देख न ले कुछ इस तरह वो अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए बोले," बेगम ! संभालो अपने लाल को, हर पल इसी के बारे में सोचती रहती थी न! अब करो जो इस की खिदमत करनी है !" ये कहते हुए मियां घर से बाहर निकल लिए।
मियां मकबूल जब कुछ देर बाद घर वापिस लौटे तो हसीना और करीम बातों में मशगूल थे। अपने बेटे के लिए बनाए गाजर के हलवे को हसीना अपने हाथों से खिला रही थी। मियां ने अपनी बेगम की ओर इशारा करते हुए कहा," कभी हमें भी इस तरह खिला दिया करो बेगम के रूह को सकूं मिले।" ये सुनते ही बेगम ने गाजर के हलवे का एक चम्मच मियां की ओर बढ़ा दिया।
सर्दियों के दिन थे। मां बेटा रजाई में बैठे थे। मियां ने भी साथ रखी एक और रजाई में अपने पांव घुसेड़ दिए , अपने बेटे की तरफ मुखातिब होते हुए वो बोले," और सुनाओ मियां क्या खबर ? " सब अल्लाह का शुक्र है अब्बा !" करीम ने जवाब दिया। करीम ने अपनी अम्मी की तरफ शरारत भरी नज़रों से देखते हुए अपनी रजाई में से एक डिब्बा निकाल कर अपने अब्बा की ओर बढ़ा दिया। अब्बा ने डिब्बे कस कर पकड़ लिया और हसीना की ओर इस तरह देखा मानो पूछ रहे हों कि तुम तो जानती हो कि आखिर इस में है क्या ! हसीना अपने पति के हावभाव को देखकर मंद मंद मुस्करा रही थी।
मियां मकबूल को समझ नहीं आ रहा था। करीम से उन्होंने पूछते हुए कि डिब्बे में क्या है,झटपट डिब्बे के ऊपर चढ़ा हुआ चमकीला कागज़ उतारना शुरू कर दिया। जैसे जैसे चमकीला कागज़ उतर रहा था उनके चेहरे पर रंगत बढ़ती हा रही थी और मियां मकबूल के दिल की धड़कन तेज़ होती जा रही थी । उनके चेहरे पर खुशी के भाव साफ देखे जा सकते थे। जैसे ही मियां ने डिब्बा खोला उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने अपने बेटे को अपने आगोश में भर लिया और उसे चूमने लगे। वो अपने बेटे की ओर प्यार भरी नज़रों से देखते हुए बोले," ख़ुदा का शुक्र है कि मेरे बेटे ने मेरी बरसों पुरानी मुराद पूरी कर दी। डिब्बे में एक प्रोफेशनल कैमरा देख कर मियां मकबूल की आंखे भर आई। करीम और हसीना मियां को मुस्कुराते हुए निहार रहे थे । कैमरे को इधर उधर घुमाते हुए मियां मकबूल के चेहरे के भाव रंग बदलने लगे थे। वो कैमरे को एक तरफ रखते हुए बोले," कितने का है? बहुत महंगा होगा ?" करीम अपने अब्बा के मन की बात को समझ गया और तुरंत बोला, " आप क्या लेते हो अब्बा! ये बताइए कैमरा अच्छा है न !" आप के पचासवें जन्मदिन का तोहफा है ये। कुछ दिन पहले ही मियां ने अपना पचासवां जन्मदिन मनाया था और करीम उसमें शरीक नहीं हो पाया था। मियां मकबूल ने फिर से कैमरे को उठा लिया और बोले अब ये तो बताओ कैसे चलेगा। करीम अपने अब्बा को कैमरा ऑपरेट करने का तरीका बताने लगा।
मियां मकबूल की खुशी का कोई ठीकाना न रहा। अब तो मियां हर वक्त कैमरा अपने साथ रखते, मानो अंधे को आंखें मिल गई हों। क्या घर - क्या बाहर वो कैमरा अपने साथ रखते और फोटो क्लिक करने का कोई मौका न चूकते। कहीं बाहर जाते तो कैमरा अपने साथ रखना कतई न भूलते। अपने दोस्त सलीम को फोन करके अपने साथ शहर के बाहर बनी झील पर जाने का आग्रह करते और सलीम और मकबूल दोनों वहां कई कई घंटे बैठे रहते और फोटो शूट चलता रहता। कैमरा डिजिटल था, कुछ ही दिनों में मियां मकबूल ने हज़ारों फोटो खींच डाली। मियां मकबूल तो सारी दुनिया की खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहते थे। मियां अपनी खुंडी को छोड़ कैमरे को अपने साथ रखने लगे। जहां भी कुछ अच्छा दिखाई देता तुरंत फोटो क्लिक कर लेते।
समय बीतता गया और मियां मकबूल के पास खेत - खलियानों , पेड़ - पौधों, बरसात, पक्षियों - जानवरों, बच्चों , औरतों - पुरुषों, इमारतों, बादलों सूरज - चंदा , लोगों के भाव, उनकी भंगिमाएं और न जाने क्या - क्या! सब कुछ उनके कैमरे में कैद था।
मियां कई बार तो किसी पार्क में जा बैठते और किसी ख़ास पल को कैद करने के लिए घंटों वहीं डेरा जमाए रहते। समय बीतता गया और मियां मकबूल का फोटो खींचने का जुनून बढ़ता चला गया। मियां के दोस्त सलीम अपने दोस्त के इस जुनून से कई बार खिज भी जाते । एक बार दोनों शाम की सैर के लिए निकले तो मियां मकबूल अपने साथ कैमरा भी ले लिए। सैर के बाद कुछ देर आराम के लिए बैठे तो मकबूल ने अपना कैमरा खोल लिया। सामने से पांच - सात महिलाओं का एक ग्रुप ज़ोर ज़ोर से चहकते हुए आता हुआ दिखाई दिया। सभी औरतों ने चटक रंग के कपड़े डाले हुए थे। उनके ठहाके और चटक रंग के कपड़े किसी रंग बिरंगे आसमान में बादलों की गर्जन का अहसास करवा रहे थे। मियां मकबूल ने झट से कैमरे को ऑटो mode पर डाला और लगे टकाटक फोटो खींचने। वो तब तक क्लिक करते रहे जब तक औरतों का झुंड उनकी आंखों से ओझल नहीं हो गया। मकबूल फोटो खींच कर जब सलीम को फोटो दिखाने लगे तो सलीम मियां फोटो को बड़े चाव से देखते हुए मज़ाक भरे लहज़े से बोले ," मियां कुछ अपनी उम्र का भी लिहाज़ करो ! कभी किसी के हत्थे चढ़ गए तो लेने के देने पड़ जाएंगे।" मियां तो ठहरे मियां वो कहां किसी की सुनने वाले थे। वो अपनी खिचड़ी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहने लगे, " अब फोटो खींचने के लिए किसी की परमिशन लेने की ज़रूरत पड़ेगी क्या ? "
समय बीतता गया और मियां मकबूल का फोटोग्राफी का शौंक भी परवान चढ़ता गया। एक दिन मौसम का मिजाज़ खुशनुमा था। उनकी बेगम मियां को बोली, "जाइए मार्केट से बेसन पकड़ लाइए। आप को पकोड़े बना देती हूं।" मियां तुरंत चल दिए । साथ में कैमरा भी उठा लिया। सोचा कि कुछ अच्छा मिला तो लगे हाथ दो - चार फोटो भी खींच लाएंगे। बेगम ने जब मियां के हाथ में कैमरा देखा तो वो भड़कते हुए बोली," अब ये मुआं कैमरा क्यों उठा लिया साथ में ? सीधे घर चले आना, कहीं कढ़ाई में तेल जलता रहे और मियां वहां फोटो ग्राफी करते रहें।" यह कह कर हसीना बुढ़बुढाने लगी। मियां ने भी "ठीक है, ठीक है।" कह कर बाहर की ओर रवानगी डाल दी। ख़ुदा की नज़रे इनायत देखिए जैसे ही मियां घर से बाहर निकले बूंदा बांदी होने लगी। मियां अपना कैमरा बचाते हुए मार्केट पहुंच गए। जब तक मियां किरयाने की दुकान पर पहुंचे मौसम अपने पूरे शबाब पर पहुंच चुका था। मार्च के महीने में सावन जैसे महीने की रंगत ने मियां का दिल बाग बाग कर दिया। किरयाने की दुकान पर लाला का बेटा अपनी दुकान छोड़ कर अपने मोबाइल से शबाब से भरे हसीं मौसम में आसपास के दृश्यों को कैद करने में मशगूल था। मियां को देखते ही लाला का बेटा खुशी भरे लहज़े में मियां से बोला," देखो चच्चा जान, ख़ुदा का नूर उतर आया है चारों ओर।" लाला का बेटा मियां के फोटोग्राफी के शौंक से बख़ूबी वाकिफ था और वो अपने द्वारा खींची फोटो मियां को दिखाने लगा। मियां में तो लाला के बेटे ने जैसे गुब्बारे में हवा भरने का काम कर दिया। मियां ने तुरंत अपने बैग में से कैमरा निकालते हुए कहा," फोटोग्राफी क्या होती है ये हम अभी तुम्हें बताते हैं।" चारों ओर लोग अपने मोबाइल निकाल कर धड़ाधड़ फोटो खींचते हुए दिखाई देने लगे। ख़ुदा का नूर देखिए जैसे ही मियां ने अपने कैमरे में बड़ा सा लेंस फिट किया, फिज़ा का रंग अपने पूरे शबाब पर था। ढलते हुए सूरज की रोशनी को बादल ढकने की कौशिश कर रहे थे और ढलते सूरज ने एक ख़ास चमक के साथ सभी चीज़ों को सोने जैसे रंग में रंग दिया। आसमान पर rainbow ( सप्तरंगी इन्द्रधनुष ) ने तो जैसे चार चांद लगा दिए। सभी इस विहंगम दृश्य को देखकर खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। मियां के हाथों की अंगुलियों में जैसे रक्त तेज़ी से घूमने लगा था। उन्होंने ने झटपट अपना चश्मा उतारा और अपने कैमरे को चारों तरफ घुमा कर टकाटक क्लिक करने लगे। कहीं आसमां को निहारते युवा युवतियां तो कहीं इन्द्रधनुष को निहारते नन्हें नन्हें बच्चे। एक तरफ किलकारियां मारती युवतियां तो दूसरी तरफ इन्द्रधनुष को अपने मोबाइल में कैद करते अलग - अलग लोग। मियां मन ही मन फूले नहीं समा रहे थे। कुछ लोग मियां को भी क्लिक कर रहे थे। उनके हाथ में प्रोफेशनल कैमरा जो था। मियां मकबूल इस पूरे दृश्य में अपने प्रोफेशनल कैमरा की वजह से सबके आकर्षण का केंद्र बिंदु बने हुए थे।
कैमरा भी जैसे मियां मकबूल की अंगुलियों पर नृत्य करते हुए अपना काम कर रहा था। मियां की एक आंख कैमरा की आंख में लगी हुई थी। कैमरा इन्द्रधनुष के साथ साथ चारों और घूम रहा था। सहसा मियां क्या देखते हैं कि एक ख़ूबसूरत महिला अपनी चौदह पंद्रह साल की बिटिया के साथ इन्द्रधनुष की फोटो खींचने में व्यस्त थीं। मियां के कैमरे को जैसे किसी ने स्टैचू बोल दिया हो और सारे परिदृश्य को भूलकर मां बेटी की फोटो क्लिक करने में जुट गया । मां बेटी दोनों ने सफेद रंग की शानदार जाकेट पहन रखी थी। कैमरा की स्क्रीन पर ऐसा लग रहा था मानो पहाड़ों से बर्फ की दो सिल्लियां ज़मीन पर उतर आई हों।
जैसे ही मियां मकबूल फोटो खींच कर किरयाने की दुकान की ओर मुड़े तो "excuse me" की आवाज़ सुनकर वो पीछे की ओर मुड़े। मां अपनी बेटी के साथ मियां की तरफ ही आ रही थी। मियां ने अपनी तरफ आते हुए देखा तो वो बड़े अदब से उनकी तरफ मुखातिब होते हुए बोले," फरमाइए ! क्या आप मुझसे कुछ कहना चाह रही हैं ?" बर्फ की सिल्ली की तरह दिखाई देने वाली मोहतरमा का मिजाज़ कुछ बदला हुआ दिखाई दे रहा था। वो मियां से बोली, " क्या आपने हमारा फोटो खींचा है?" "जी देखिए!" मियां ने तुरंत अपने कैमरे की स्क्रीन खोल दी और मां - बेटी को उनकी फोटो दिखाने लगे। मियां मन ही मन इतने ख़ुश थे कि उन्हें ऐसा लगने लगा मानों मां बेटी उनके द्वारा खींची गई फोटो को देख कर ख़ुशी से फूली नहीं समाएंगी। मियां ने भी जब फोटो देखा तो उनके मन में अपनी बेटी यास्मीन और बेगम हसीना के चेहरे उतर आए। एक लंबे अरसे के बाद मियां को लगा की बेजान तस्वीरें भी बोलती हैं।लेकिन ख़ुदा को तो कुछ और ही मंज़ूर था। फोटो देखकर मोहतरमा किसी आग के गोले की तरह दहकते हुए बोली," how you dared to click our photos without our permission?" ( हमारी इजाज़त के बिना आप की हिम्मत कैसे हुई हमारी फोटो खींचने की?") मियां की ख़ुशी को जैसे ग्रहण लग गया। एकदम से विपरीत परिस्थिति का तो जैसे उन्हें कतई अंदेशा ही न था। मियां अपने आप को संभालते हुए बोले, " Madam , It just went randomly. I was clicking as you and I hadn't any intention to specially click your photo." ( "मोहतरमा ! आप की तरह मैं भी फोटो खींच रहा था और आप की फोटो इत्तफाक से क्लिक हो गई।") मियां इस से पहले कि कुछ और बोलते मोहतरमा ने तुरंत अपना पहले वाला प्रश्न दाग दिया," लेकिन आपने हमारी फोटो बिना इजाज़त के कैसे खींची ? इसको तुरंत डिलीट कीजिए ।" इस बार वो अपना गुस्सा हिंदी में उतार रही थी। साथ ही मोहतरमा ने मियां का पूरा बायोडाटा लेना शुरू कर दिया। मियां मकबूल के मन में कुछ बुरा तो था ही नहीं और वो मोहतरमा को अपने बारे में जानकारी देते चले गए। मोहतरमा किसी वूमेन सैल की इंस्पेक्टर की तरह प्रश्न दागे जा रही थी और थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। मियां किसी कटघरे में खड़े अपने आप को किसी मुजरिम की तरह महसूस करने लगे। मियां ने उस मोहतरमा को लाख समझाने की कोशिश की लेकिन महिला तो जैसे बात का बतंगड़ बनाने पर आमदा थी। सभी वो लोग जो इन्द्रधनुष की तस्वीरें खींचने में व्यस्त थे मौके की नज़ाकत को समझने के लिए भीड़ में तब्दील होने लगे। लोगों को जमा होते देख महिला बुलंद आवाज़ में चिल्लाने लगी,"देखिए तो सही इस बूढ़े की हिमाकत ! मां बेटी को अकेला देखकर फोटो खींच रहा था।" भीड़ के बीच में से एक युवा उस महिला का साथ देते हुए बोला, " मियां अपनी सफेदी का तो ख्याल किए होते। हमारे इलाके में होते तो आपको दिखा दिए होते बहू - बेटी की के साथ बद्तमीज़ी करने का सिला। इससे पहले कि मियां कुछ बोल पाते काली का रूप धारण करते हुए वो महिला बोली, " अभी डिलीट करिए हमारी तस्वीरों को।" तू कौन मैं खामखां वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए एक लड़का चिल्लाया, " अरे फोटो क्यों डिलीट करनी हैं, कैमरा ही तोड़ डालो इसका।" अपना डायलॉग बोलने के बाद उस लड़के अपने बालों पर हाथ फेरते हुए जमा भीड़ के ओर इस तरह देखा मानो आज का हीरो वही हो।मौके की नज़ाकत को समझते हुए मियां ने तुरंत फोटो डिलीट करने में ही समझदारी समझी। मियां मकबूल के हाथ कांपने लगे थे, पूरा शरीर पसीने से तर बतर हो चुका था। बमुश्किल डिलीट का बटन दबा पाए और इस पूरे प्रकरण में महिला के चेहरे के भाव जस के तस बने हुए थे।
भीड़ मियां पर अपने अपने ढंग से व्यंग कस रही थी। मियां अपने आप को संभालते हुए लाला की दुकान पर पहुंचे, बेसन खरीदा और घर की ओर रवानगी डाल दी। घर में बेगम को ये किस्सा बताएं या न बताएं ये अभी सोच ही रहे थे कि वो घर की ड्योढ़ी के सामने खड़े थे। मियां को देख हसीना ज़ोर से चिल्लाई, मुए कैमरे ने तो आपको सच में पागल बना दिया है।" यह कहते हुए हसीना मियां के हाथ से बेसन का लिफाफा झटक कर ले गई। मियां तो जैसे ज़मीन में ही दफन हो जाना चाहते थे। वो वहीं खड़े खड़े गुनगुनाने लगे," ये रंग बिरंगी दुनिया,ये सत रंगी दुनिया। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है। ये रंग बिरंगी दुनिया, ये सत रंगी दुनिया ।" समय निकाल कर पढ़ लेना।
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