Saturday, 13 April 2019

मोहम्मद जलालुद्दीन उर्फ डोसे वाले डॉक्टर साब।
भाई डॉक्टर अजय शर्मा Ajay Sharma को मेरी ओर से ढेरों बधाई  उनके नाटक मोहम्मद जलालुद्दीन के लिए और शुक्रिया मेरे लिए इस नाटक को उपलब्ध करवाने के लिए।
ये डॉक्टर अजय शर्मा की खासियत है कि जिस काम को वो अपने हाथों में लेते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते। यही कारण है कि वो अब तक 11उपन्यास, 1कहानी संग्रह, एक पंजाबी नाटक " छल्ला मुड़ के नहीं आया। और अब एक हिंदी नाटक " मोहम्मद जलालुद्दीन " लिख चुके हैं । उनके एक उपन्यास " बसरा की गलियां" का  इंग्लिश में अनुवाद भी ही चुका है।
पेशे से डॉक्टर भाई अजय शर्मा साहितिक और लेखन क्षेत्र में आज जिस मुकाम पर पहुंचे हैं,उसके पीछे उनका एक लंबा संघर्ष है।
डॉक्टर अजय शर्मा से मेरी मुलाकात नब्बे के दशक में ,करीब 28 बरस पहले करनाल में हुई थी।80 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के बाद बहुत सारे परिवार पंजाब छोड़ कर आसपास के राज्यों में विस्थापित हो गए थे। कामकाज ठप्प हो गए थे और चैन से जीना मुश्किल हो गया था। डॉक्टर अजय भी अपनी ज़िन्दगी की नई पारी की शुरुआत करने के लिए अपने परिवार और भाई के साथ करनाल अा बसे थे। काम के सिलसिले के लिए कोई दुकान और रहने के लिए मकान की तलाश में उनका मेरे एक दोस्त नवीन की दुकान पर आना जाना होता था। नवीन प्रॉपर्टी डीलर का काम करता था। मेरी मुलाकात उनसे वहीं पर हुई। उनसे बातचीत के बाद विचार मिलने लगे। ख़ाकसार नाटक के क्षेत्र से था और डॉक्टर साहेब भी कभी कभी कोई कहानी किस्सा सुना दिया करते।वो भी बताया करते कि उनकी दिलचस्पी भी एक्टिंग में है। उन दिनों उनकी सुनाई कहानियां मुझे अच्छी लगती।
डॉक्टर साब ने अपने भाई के लिए शहर के बीचों बीच क्लब मार्केट में एक दुकान ले ली और वहां डोसे की दुकान खोल दी। काम चल निकला था। उन दिनों क्लब मार्केट " heart of city" कहलाता था। शहर के नामचीन लोग और कॉलेज के समय में प्रेमी जोड़ों के लिए ये एक ख़ास अड्डा था। डॉक्टर साब जब भी डोसे की दुकान पर आते मुझे फोन करके वहां बुला लेते। अब शाम के वक़्त मेरा ज़्यादातर समय वहीं गुजरने लगा था। नाटक, साहित्य और फिल्मों के बातों के ऐसे दौर चलते की कब रात हो जाती पता ही न चलता। अब बैठक देर रात तक चलने लगी थी। एक दूसरे के घर आना जाना भी होने लगा था। घर में  माता पिता जब देर से आने पर गुस्सा करते तो मैं घर पर सफाई कुछ इस तरह देता , " अरे मैं डोसे वाले डॉक्टर के यहां था, कोई आवारागर्दी थोड़ा ही कर रहा था।" उनको यकीं हो जाए कि मैं वहीं था तो कभी कभी कभी डोसे पैक भी करवा कर ले जाता। इस तरह डॉक्टर अजय शर्मा मेरे घर वालों के लिए "डोसे वाले डॉक्टर साब" हो गए थे।
 व्यक्ति अपनी ज़मीं को कभी नहीं भूल सकता।जब भी हमारी बैठक होती डॉक्टर साब  जालंधर के बारे में बात करना कतई न भूलते।उनकी पत्नी जालंधर में ही सरकारी हस्पताल में कार्यरत थी। वो भी अक्सर लंबी छुट्टी लेकर करनाल अा जाती। डॉक्टर साब का मुंबई जा कर एक्टिंग में अपनी किस्मत आजमाने का इतना जनूं था कि वो सब कुछ छोड़ कर मुंबई भाग जाने का प्लान करने लगे थे। उनकी इस बात से घर के लोग परेशान रहने लगे थे और ख़ासकर उनकी पत्नी।
खैर समय की करवट के साथ डॉक्टर अजय के जीवन में भी परिवर्तन आया और वो करनाल में अपना सब कुछ बेचकर दोबारा जालंधर सेटल ही गए।हालांकि उस समय उन्हें काफी घाटा उठाना पड़ा था।
कहते है कि दिल को दिल से राह होती है। उन दिनों मेरा एक मित्र Puneet Sehgal  आल इंडिया रेडियो में प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव के पद पर कार्यरत था और Daljinder Basran भी वहीं सेटल था। मेरे लिए तो जैसे सोने पर सुहागे जैसा हो गया। पुनीत भाई ऑल इंडिया रेडियो में नाटक विभाग में था और अपने साथियों को रेडियो में रिकॉर्डिंग काम देकर खूब सहयोग करता। मेरा भी ऑल इंडिया रेडियो में रिकॉर्डिंग के सिलसिले में आना जाना लगा रहता था। मैं जब भी जालंधर जाता तो दलजिंदर के घर ही ठहरता। वहां भाई अजय शर्मा का भी आना हो जाता। कई बार तो हम दलजिंदर के घर के बिल्कुल नज़दीक जालंधर के बस स्टैंड के बाहर देर रात तक अपनी बैठक जमाए रहते। तब का बना सिलसिला आज तक बदस्तूर जारी है।
आज भाई अजय शर्मा का लिखा नाटक मोहम्मद जलालुद्दीन हाथ में आया तो मन गदगद हो गया। अब तक चार बार पढ़ चुका हूं। नाटक धार्मिक सौहार्द के लिए एक बेहतरीन सौगात है। नाटक में मध्यम वर्गीय परिवारों के अवचेतन में दबी कश्मकश को बख़ूबी बयां किया गया है। मुंबई के परिवेश पर आधारित इस नाटक के डायलॉग रवानगी लिए हुए हैं और पात्रों के संवादों में ठहराव है। मध्यम वर्गीय पृष्ठ भूमि के पात्रों के संवाद इतनी संजीदगी से बुने गए हैं कि ख़ाकसार को पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो वो उसकी अपनी कहानी हो। भाई अजय शर्मा के इस नाटक में कमाल यह है कि सादगी भरे संवाद पात्रों को जीवंत रखते हैं। जैसे हर व्यक्ति के अवचेतन रूपी कोठरी में अनेक चरित्र अपना डेरा जमाए रहते हैं,मोहम्मद जलालुद्दीन नाटक के पात्रों को को भी कुछ इस तरह ही गढा गया है।बशीर का एक संवाद आदमी के अंदर आदमी की कहानी को बयान करता है, " वैसे भी तुम तो जानती हो कि मेरा दिल भले ही कठोर है,लेकिन कब मोम की तरह पिघल जाए यह तो आज तक बशीर ख़ुद भी नहीं जान सका। नाटक में मुंबई नगरी कि चकाचौंध के पीछे के अंधेरे को अजनबी और सलमा के संवादों के ज़रिए बड़ी सादगी से रेखांकित किया गया है।नाटक के ज़रिए हमारे राजनीतिक सिस्टम पर भी कोठाराघात किया गया है। इस के ज़रिए एक अच्छा संदेश ये देने की कोशिश की गई है कि बेशक चंद लोग जाने अंजाने राजनीतिज्ञों की कठपुतली बन कर नंगा नाच करने लगते हैं लेकिन आम आदमी के अवचेतन में प्रेम,भाईचारा , मानवता और सौहार्द कूटकूट कर भरा हुआ है चाहे वो किसी भी धर्म से संबंध रखते हों। नाटक के अंत तक सस्पेंस बना रहता है। अंत में जिस तरह सलमा अजनबी को हिन्दू और मुस्लिम होने का ज़िक्र करती है, वो साफ दर्शाता है कि आज भी मध्यम वर्गीय लोग अपने आसपास बुने अनचाहे बंधनों की दीवारों को तोड़ना तो चाहते हैं लेकिन संकीर्ण सोच वाले समाज के दबदबे और उनके द्वारा रचित इन दीवारों को तोड़ना शायद बहुत मुश्किल है। ख़ाकसार को लगता है कि नाटक में ऑनर किलिंग का डर भी शायद आम आदमी को अपने सपनों को साकार करने में रोकता है बेशक लेखक ने इस का कहीं ज़िक्र न किया हो। नाटक को सुखद या दुखद न बना कर पाठक और दर्शक को चिंतन या यूं कहें कि आत्मचिंतन के लिए छोड़ देना भाई अजय की काश्तकारी का कमाल है। नाटककार समाज में परिवर्तन तो चाहता है लेकिन इस का निर्णय को दर्शक के ऊपर छोड़ देता यही इस नाटक की खासियत भी है।ऐसा लगता है कि डॉक्टर साब ने अपने अवचेतन में दबी अपनी ही कहानी को "मोहम्मद जलालुद्दीन" के ज़रिए बुनने का काम किया है जो की कतई आसान नहीं होता।
अंत में ढेरों बधाई  भाई अजय शर्मा को एक बेहतरीन सौगात के लिए। जल्द ही मोहम्मद जलालुद्दीन नाटक को मंचित करने का प्रयास करूंगा। इसी बहाने अवचेतन में दबी कुछ अनकही बातें और आप के साथ बिताए कुछ बेहतरीन पलों को यादगार बनाने का मौका भी मिल गया।

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