Saturday, 19 June 2021

झुमरू की प्रेम कहानी

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झुमरू की प्रेम कथा
यह किस्सा लगभग एक साल पुराना है , सैर करते हुए Sameer Paul ने अपनी स्पीड तेज़ कर दी। ये कोई पहली बार नहीं था। समीर की ये आदत है,हमेशा जल्दी में रहता है। लेकिन यदि कोई ख़ास वजह हो तो उसकी जल्दी और बढ़ जाती है। हम दोनों शाम को अटल पार्क में रोज़ाना लगभग 45 से 50 मिनट सैर करते थे। अभी कोई 15 से 20 मिनट की सैर बाकी थी। समीर की तेज़ी के बाद मैंने गैप को कवर करते हुए पूछा, "आज कौन सी ट्रैन पकड़नी है ?" वो अपनी मुंडी पीछे घुमा कर मुस्कुराते हुए बोला,"ड्रीम गर्ल देखने जाना है।" वो अभी पिछले हफ्ते ही छिछोरे फ़िल्म देख कर आया था। उसे सिर्फ फ़िल्म देखने का शौक़ नहीं है बल्कि वो एक अच्छा क्रिटिक भी है। छिछोरे फ़िल्म देखने के बाद उसने फ़िल्म की स्टोरी सुनाते हुए बताया था कि जो व्यक्ति कभी भी होस्टल में रहा है उसे यह फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए। ड्रीम गर्ल के बारे में उसने बताया कि ट्रेलर तो अच्छा लग रहा है। इसमें आयुष्मान लड़कियों की आवाज़ निकाल कर लोगों का बेफकूफ़ बनाता है।
ख़ैर जब उसने ड्रीम गर्ल का ज़िक्र किया तो मैंने उसे बताया कि #nehasaraf ने भी इसका पोस्टर अपने फेसबुक पर डाला हुआ है । उसने तुरंत मुझसे पूछा, "कोई रोल है क्या उसका इस फ़िल्म में ?" "मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है ," मैंने जवाब दिया। रविवार को सैर का schedule सुबह का हो जाता था। कल की सैर के लिए पांच बजे का समय फिक्स हो गया था। जब साढ़े चार बजे तक समीर का फ़ोन नहीं आया तो मैंने ही घंटी बजा दी। वो नींद में था,फ़िल्म देखने के बाद रात देर से लौटा था। नींद में ही उसने आज का कार्यक्रम रद्द करते हुए मुझे बताया। मैंने भी आज सैर कैंसिल करना ही बेहतर समझा। 
मैंने अपने फेसबुक का पिटारा खोला तो फेसबुक पर सबसे पहली पोस्ट नेहा की दिखाई दी। इसमें नेहा ने ट्रेलर का लिंक पोस्ट किया हुआ था। नेहा की पोस्ट से पता चला कि इस फ़िल्म में उसने कोई रोल किया है। मैंने तुरन्त लिंक पर अंगुली दबा दी। ट्रेलर देखकर मज़ा आ गया। आयुष्मान लड़की की आवाज़ निकाल कर बहुत ही खूबसूरती से लोगों को उल्लू बनाता है। ड्रीम गर्ल का ट्रेलर देखते ही मेरे ज़हन में लगभग 20 बरस पुराना एक किस्सा चक्कर लगाने लगा।
मेरे एक मित्र हैं नवीन। जब मैं कॉलेज में पढ़ता था तो वो फ़ोटो स्टूडियो चलाता था।अपनी मेहनत और लगन से आज वो बहुत नामी प्रॉपर्टी डीलर है। यह बात उन दिनों की है जब अधिकतर लोगों के घरों में टेलीफोन नहीं हुआ करते थे। नवीन सुविधा वाली गली से मेला राम स्कूल मार्केट में शिफ्ट हो गया था। उन दिनों लोग टेलीफोन करने के लिए एसटीडी बूथ पर जाया करते थे। मुझे याद है रात को इन बूथों पर लोगों का जमावड़ा लगा रहता था क्योंकि रात के समय कॉल करने के रेट आधे हो जाते थे। टेलीफोन लाइन व्यस्त होने के कारण बहुत सारे लोग बैरंग लौट जाते थे। हमने भी भाई नवीन कि दुकान पर एक एसटीडी बूथ लगवा दिया। सोचा था कि कुछ साइड इनकम हो जाया करेगी। चूंकि प्रॉपर्टी की दुकान थी इसलिए ग्राहकी कम थी। वहां ऑफिस को संभालने वाला छोटा भाई रवि ही उसका हिसाब किताब रखता था। रवि को ज़्यादा काम तो होता नहीं था सो वो फुरसत में अपने दोस्तों को इधर उधर फोन लगा कर मशगूल रहता।
रवि का एक दोस्त गांव से शहर में आकर नौकरी करने लगा था। उसका नाम तो मुझे याद नहीं लेकिन एक सीधा साधा युवक शहर में आकर रहने लगा था। शहर की चकाचौंध से वो बहुत प्रभावित था। किसी राइस मिल में काम करता था। कभी कभी उससे प्रॉपर्टी की दुकान पर मुलाकात हो जाती। हालांकि रवि भी जब गांव से शहर में आया तो बहुत सीधा सा था। लेकिन उसे शहर में आए 10 बरस हो चुके थे और शहर की आबोहवा में घुलमिल गया था और दावपेंच लगाने लगा था। चूंकि रवि बचपन से ही बातूनी था तो अपनी बातों से सब का प्रिय भी बन गया था। हमारी मित्र मंडली का वो ख़ास हिस्सा बन गया था। 
जब भी समय मिलता उसका दोस्त भी उसको मिलने वहां आ जाता। उससे कभी कभी हमारा भी टाकरा हो जाता। हम जब भी फ़ुरसत में होते रवि अपने दोस्त की भोली भोली बातों के किस्से हमें सुनाता रहता। रवि को प्रॉपर्टी के लिए इधर उधर जाना पड़ता था तो तय हुआ कि किसी लड़की या लड़के को टेलीफोन बूथ पर रख लिया जाए। एक लड़की को टेलीफोन बूथ पर रख लिया गया , लेकिन कोई 10 - 15 दिन काम करने के बाद वो नौकरी छोड़ कर चली गई। इसी दौरान एक दिन के लिए रवि के दोस्त की मुलाकात उस लड़की से भी हो गई । उन दोनों की आपस में कोई बात नहीं हुई लेकिन न जाने कैसे वो एक ही बार देखने पर अपना दिल हार बैठा। इस मामले में रवि काफ़ी तेज़ था। उसने अपने दोस्त के मन की बात को भांप लिया। उसने अपने दोस्त की बातें सुनने के बाद अपनी चिकनी - चुपड़ी बातों से उसे पक्का विश्वास दिला दिया कि वो लड़की भी पहली नज़र में उसकी दिवानी हो गई है। हम जब भी दुकान पर जाते तो रवि हमें अपने दोस्त के किस्से मक्खन लगा कर सुनाता और हम भी चटकारे लेकर उसके किस्से सुनते और खूब हंसते। मैंने उसके दोस्त के किस्सों से प्रभावित हो कर उसका नाम झुमरू रख दिया लेकिन झुमरू को उसके नए नाम करण की ख़बर नहीं लगने दी।
झुमरू अधिकतर लंच ब्रेक में नवीन की दुकान पर आता था। जब भी वो उस लड़की के बारे में रवि से पूछता तो उसे कहता कि वो दोपहर को लंच के लिए अपने घर चली जाती है। उसे इस बात की कतई भनक नहीं लगने दी गई कि वो लड़की नौकरी छोड़ कर चली गई है।
एक दिन मैं शाम को दुकान पर पहुंचा तो रवि ने बताया कि झुमरू बेचारा उस लड़की का दीवाना हो गया है और बार - बार उससे बात करवाने को कह रहा है। उन दिनों मोबाइल तो दूर की बात घर पर लैंड लाइन फोन होना भी बहुत बड़ी बात होती थी। उसने अपने ऑफिस का नंबर रवि को दे दिया। थिएटर 🎭 का छात्र होने के कारण मैं भी कुछ आवाज़ें निकाल लिया करता था। पता नहीं उस समय मेरे दिमाग में क्या सूझा और मैंने रवि को झुमरू का नंबर लगाने के लिए बोला। रवि ने भी आव देखा न ताव झुमरू का नंबर लगा दिया। मैं नहीं जानता ये उसकी बदनसीबी या खुश नसीबी थी ,उधर फोन झुमरू ने ही उठाया। रवि के चेहरे पर खुशी के भाव साफ नज़र आ रहे थे। वो बोला," भाई क्या हाल हैं ?" हालचाल पूछने और इधर उधर की बातें करने के बाद उसने उसे कन्फर्म कर दिया कि टेलीफोन बूथ वाली लड़की आई हुई है और वो उससे बात करना चाहती है। झुमरू को सब समझाने के बाद उसने टेलीफोन मेरे हाथ में थमा दिया। मैंने लड़की की आवाज़ में उसे हैलो बोला तो झुमरू की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। झुमरू तो मानो नीलम का सदियों से दीवाना हो। हमने उस लड़की का काल्पनिक नामकरण कर दिया था। अपने दिल की बातें करने के बाद वो सीधा नीलम से मिलने की गुहार लगाने लगा। नीलम ने शुरू में तो न नुकर की लेकिन जल्द ही मिलने का वायदा कर के फ़ोन काट दिया। टेलिफोन पर सभी कान लगा कर बैठे थे और मेरी यानी कि नीलम और झुमरू की बातों का लुत्फ़ उठाते हुए लोटपोट हुए जा रहे थे। मैंने जैसे ही फ़ोन को नीचे रखा सभी हंसते हंसते पागल हुए जा रहे थे और सब की हंसी रोके नहीं रुक रही थी। जब सब की हंसी रुक गई तो आगे की रणनीति तैयार की गई। 
  झुमरू अगले दिन सुबह ही रवि के पास पहुंच गया। जब दोपहर तक नीलम नहीं पहुंची तो उदास मन से बोला," क्या बात रवि आज वो क्यों नहीं आई?" रवि ने उसके छुट्टी पर होने का बहाना लगा दिया। इस तरह हर रोज़ झुमरू और नीलम की बातों और रवि के बहानों का सिलसिला बदस्तूर शुरू हो गया। झुमरू को जब भी मौका मिलता वो अलग अलग समय पर नीलम से मिलने के लिए वहां धावा बोल देता। आख़िर नीलम वहां होती तो उसे मिलती ! चतुर रवि हररोज़ एक नई कहानी बना कर उसे संतुष्ट कर देता। यह सिलसिला करीब दस पंद्रह दिन चलता रहा पर भोला झुमरू बिल्कुल नहीं समझ पाया कि उसके साथ धोखा हो रहा है। यहां सबको हंसने हंसाने में ख़ूब आनंद आ रहा था इसलिए उन दोनों का मिलन कार्यक्रम फिक्स नहीं किया जा रहा था।
आख़िर बहुत दिन मज़े लेने के बाद एक दिन झुमरू से बात करते - करते नीलम ने दो दिन बाद सशर्त मिलने का वायदा कर ही डाला। झुमरू भावुक होते हुए बोला," नीलम आप मुझे धोखा तो नहीं दे रही हो न!" नीलम ने भी बड़ी सादगी से पूछा," मैंने तो आपको एक बार ही देखा है और मुझे तो आपकी अब शक्ल भी याद नहीं! ऐसे में मैं आप को कैसे पहचानूंगी!" झुमरू बोला," लेकिन मैं तो आपको पहचानता हूं। आप बस अड्डे के सामने ओडियन स्वीट्स के सामने आ जाना। मैं आपको पहचान लूंगा और वहीं ओडियन में कुछ देर के लिए बैठ जाएंगे," झुमरू ने समस्या का समाधान करते हुए अपनी बात रखी। उन दिनों ओडियन स्वीट्स एंड रेस्तरां युवाओं की बैठक के लिए एक ख़ास जगह थी। 
इधर नीलम ने भी भोलेपन से बात करते हुए कहा," न बाबा न ! ऐसे तो बिल्कुल भी नहीं! कोई मुझे और मिल गया और मेरा किडनैप कर के ले गया तो मैं तो किसी को मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहूंगी।" नीलम के बातें सुनकर झुमरू असमंजस में पड़ गया और उसने चुप्पी साध ली। मौके की नज़ाकत को समझते हुए नीलम एक नया दांव खेलते हुए बोली," ऐसे नहीं हो सकता कि हम कहीं और मिल लें!" झुमरू बड़ी सादगी से बोला," ये जगह ठीक है। यहां पुलिस का भी डर नहीं है। उन दिनों युवा जोड़ों पर पुलिस बहुत सख़्ती करती थी और ऐसे जोड़ों को ब्लैकमेल करके ख़ूब माल बनाती थी। नीलम ने उसके डर को भांपते हुए चुटकी ली, " जो आप जगह बता रहे हो वो सुरक्षित तो है ?" " हां ! हां ! बिल्कुल सुरक्षित है," झुमरू सफ़ाई देते हुए बोला। हालांकि झुमरू कभी इस रेस्त्रां में नहीं गया था। इधर रवि और दूसरे साथी लोगों की हंसी थम नहीं रही थी सभी फोन पर कान लगा कर एक दूसरे के साथ सटके खड़े थे। उधर झुमरू नीलम की बातों से बेशक परेशान था पर इस बार मिलने का मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहता था।
बातचीत लंबी हो चुकी थी लेकिन सभी लोग इतने आनंदित थे कि यह सिलसिला थमने देना नहीं चाहते थे और बार बार अपने हाथों से इशारा कर के बात को आगे बढ़ाने को कह रहे थे। इसलिए नीलम ने अपनी शर्तों के पिटारे में से एक शर्त और रख दी। नीलम बोली," आप क्यों मिलना चाहते हो मुझ से। मेरी बहन बताया करती है कि अकेले में लड़के मौका देख कर लड़कियों से छेड़छाड़ करने लगते हैं। वो कहती है कि लड़के ऐसे में च्यूंटी मार देते हैं।" इससे पहले कि झुमरू कुछ बोलता नीलम ने बात को आगे बढ़ाते हुए फिर एक प्रश्न दाग दिया," अच्छा ये बताओ! जब हम मिलेंगे तो आप च्यूंटी तो नहीं मारोगे!" ये संवाद बोलते ही नीलम भी अपनी हंसी का फव्वारा नहीं रोक पाई और उसकी हंसी की आवाज़ दूसरी तरफ़ न जाए उसने स्पीकर पर हाथ रख लिया। "च्यूंटी! आख़िर मैं तुम्हें च्यूंटी क्यों मरूंगा!" झुमरू सफ़ाई देते हुए बोला। वो नीलम की अटपटी बातों पर हैरान हो रहा था।
नीलम मिलने के लिए स्थान और समय तय करने से पहले बहुत सारी पहेलियां बुझाने के लिए झुमरू को देती रही और झुमरू घुमाफिरा कर मिलने की बात पर ले आता। आख़िर में यह तय हुआ कि एक दिन बाद ओडियन स्वीट्स पर ही मिला जाएगा। लेकिन मिलने से पहले नीलम ने एक शर्त और रख दी। गर्मियों के दिन थे। नीलम ने यहां अपना नया पैंतरा खेला। "देखो आप ऐसा करना परसों जब आप वहां आओ तो कोट पैंट में आना और आप के हाथ में गुलाब का फूल होना चाहिए," नीलम ने बहुत ही प्यार भरे अंदाज़ में उसे बोला। "कोट पैंट !" झुमरू बोला। वो कुछ और बोलता उससे पहले ही नीलम ने बड़ी सादगी से उसे समझाते हुए कहा," मैं समझती हूं कि गर्मियों के दिन हैं,परंतु इससे आप को पहचानने में आसानी होगी। हां ! आप पूरे 11 बजे वहां पहुंच जाना, कहीं मैं वहां पहुंच कर बगुले झांकती फिरूं। ध्यान रहे गुलाब का फूल लाना बिल्कुल न भूलना। अच्छा अब मैं फ़ोन रखती हूं।" यह सब कह कर नीलम ने फ़ोन रख दिया।
झुमरू नीलम की इस अटपटी शर्त से बिलकुल नहीं घबराया। वो लगा अपना दिमाग घुमाने कि आख़िर पैंट कोट का इंतज़ाम कहां से किया जाए। इधर रवि और वहां मौजूद सभी लोगों का हंसते हंसते पेट फटने को हो रहा था।
सभी संभले भी नहीं थे कि ट्रिन ट्रिन करके फ़ोन बजने लगा। ट्रिन ट्रिन की आवाज़ सुनकर सभी समझ गए कि हो न हो यह फ़ोन झुमरू का ही होगा। रवि की हंसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी। उसने हंसते हंसते फ़ोन का रिसीवर उठाया। उधर से झुमरू की आवाज़ थी। झुमरू की आवाज़ सुन कर रवि और ज़ोर से हंसने लगा। झुमरू और रवि के बीच करीब एक घंटा बात चलती रही ।

झुमरू ने नीलम के साथ हुई बातचीत का कोई ज़िक्र नहीं किया। इधर उधर की बातें करने के बाद वो रवि से बोला," भाई तेरे पास पैंट कोट है न काले वाला !" "पैंट कोट! " रवि ने आश्चर्य से पूछा। "हां भाई, पैंट कोट काले रंग का," दूसरी तरफ़ से झुमरू बोला। रवि की हंसी का फव्वारा दोबारा फूटने लगा था। बमुश्किल अपनी हंसी को रोकते हुए वो बोला," भाई इतनी गर्मी में पैंट कोट का क्या करेगा?" झुमरू तो जैसे इस सवाल के जवाब की तैयारी पहले से ही किए हुए था। वो झट से बोला," भाई शादी में जाना है।" "लेकिन इतनी गर्मी में पैंट कोट कौन पहनता है भाई ! और वो भी काले रंग का!" रवि हंसते हुए बोला। इस बार भी झुमरू सवाल का जवाब देने के लिए तैयार था। "भाई बारात सहारनपुर शहर मैं जावेगी , बस इसलिए सोच रहा था," झुमरू ने बड़ी चतुराई से जवाब दिया। रवि मुस्कुराते हुए बोला," अच्छा ये बात है! भाई ने बारात में जाना है।" रवि ने अपना पैंट कोट घर से लेने के लिए कहा। 
झुमरू अपनी चतुराई पर फूला नहीं समा रहा था। उसने इस समस्या का भी हल निकाल लिया था।
मुलाकात का दिन इतवार को मुकर्रर था। रात भर झुमरू करवटें बदलता रहा।उसे नींद नहीं आ रही थी। वो रात भर मुंगेरी लाल की तरह सपने बुनता रहा। रात इतनी लंबी होती है उसे आज पता चला था। ख़ैर सुबह उठते ही वो अपने खेतों की ओर निकल लिया। खेतों में ट्यूबवेल के साथ बनी क्यारी में लगे सभी गुलाब के फूलों को तोड़ कर एक लिफाफे में रख लिया। वो किसी प्रकार का रिस्क नहीं लेना चाहता था। इसलिए उसने बहुत सारे फूल तोड़ लिए। कुछ देर वो ट्यूबवेल पर ही बैठा नीलम के बारे में सोचता रहा। जब वो घर वापिस जा रहा था तो उसे ख़्याल आया कि अगर वो कोट डाल कर घर से निकला तो सभी उसपर शक करेंगे और मज़ाक उड़ाएंगे। घर पहुंचते ही उसने सब से पहले कोट को छिपाने का प्रबंध किया। कोई लिफाफा तो उसे मिला नहीं तो उसने खाद की बोरी में कोट को बंद कर दिया। सब कुछ दुरुस्त कर लेने के बाद उसने घड़ी को देखा तो अभी सात ही बजे थे। उसे लगा समय जैसे थम सा गया है। उसने घड़ी को ध्यान से देखा, वो चल रही थी।
जैसे -तैसे दस बजे,झुमरू ने चलने की तैयारी शुरू कर दी। उसने अपने कोट वाली बोरी को अपने मोटर साइकिल के पीछे लगे कैरियर पर बांधा और खूंटी पर टंगे एक झोले में फूलों वाला लिफाफा डाल कर अपने मोटर साइकिल के हैंडल पर टांग लिया। बरामदे के कोने में बने चूल्हे पर उसकी मां रोटियां सेक रही थी। अपने बेटे को तैयारी करते हुए देखा तो आश्चर्य से बोली,"आज काम के लिए देर नहीं हो गई!आ जा बेटा गर्म गर्म रोटी खा ले और मैंने साथ के लिए भी बांध दी हैं।" झुमरू की मां हर रोज़ दोपहर के लिए रोटियां बांध देती थी। "आज मुझे फैक्ट्री के काम से बाहर जाना है, वहीं कुछ खा लूंगा।" मां की बात का जवाब देते ही उसने मोटर साइकिल पर किक लगाई और घर से बाहर हो लिया।
रास्ते में वो सोचता रहा कि आख़िर वो नीलम से कैसे बात करेगा! किसी फिल्मी हीरो की तरह उसके हाथों को अपने हाथों में पकड़ कर और उसकी आंखों में आंखें डाल कर वो आज अपने मन की बात नीलम को कह ही डालेगा। अभी वो सब सोच ही रहा था कि वो अपने गंतव्य पर पहुंच गया। 
उसने अपनी योजना के अनुसार मोटर साइकिल ओडियन के सामने बस अड्डे में बने स्कूटर स्टैंड में खड़ी कर दी। अपने कोट वाली बोरी में से कोट निकाला और फूल वाला लिफाफा उठा कर वो अड्डे पर बने पेशाब घर में घुस गया। वहां गंदी बास से उसका दम घुटने लगा। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसपर तो नीलम से मिलने का जनून सवार था। एक दीवार पर धुंधला चुके आईने के सामने खड़े हो कर उसने कोट डाला और अपने को उस आईने में निहारने लगा। उसे कुछ साफ नज़र नहीं आ रहा था। उसने लिफ़ाफे में रखे फूलों को कोट की जेब में रखा और इधर उधर देखकर उस लिफ़ाफे से आइना साफ करने लगा। आईना समय के साथ बुरी तरह से गंदा और धुंधला हो चुका था। उस पर लिफ़ाफे की रगड़ाई का कोई ज़्यादा असर नहीं पड़ा लेकिन उसको अपनी धुंधली छवि नज़र आने लगी थी। मोटर साइकिल पर आने की वजह से उसके बाल किसी रेगिस्तान में लगे कंटीले झाड़ की तरह दिखाई दे रहे थे। आईने के नीचे लगे वाश बेसिन में लगी टूंटी से पानी बह रहा था। इस वाश बेसिन की हालत आईने से भी ज़्यादा बदतर थी। #वो #किसी #भरे #ज़ख्म #की #तरह #लग #रहा #था #और #टूंटी #से #बूंद #बूंद #बहता #पानी #उस #ज़ख्म #से #रिसते #मवाद #सा #दृश्य #बना #रहा #था। झुमरू ने अपने दोनो हाथ उस टूंटी के नीचे रख दिए और पानी को अपने मुंह और सिर पर लगा कर अपनी जेब से कंघी निकाल कर अपने बाल सेट करने लगा। जब उसे सब दुरुस्त लगा तो वो उस अंधेरे वाश रूम से बाहर निकल आया।
बाहर निकलते ही उसकी जान में जान आई। वो पसीने से तर बतर हो चुका था। उसने पैंट की जेब में हाथ मारा तो रुमाल नदारद था। उसे याद आया कि जल्दी जल्दी में वो रुमाल लेना तो भूल ही गया। उसने दीवार की तरफ़ अपने को घुमा लिया और माथे का पसीना अपनी बाजू से ही साफ़ कर लिया। कोट की जेब में धीरे से हाथ डाल कर पक्का कर लिया कि गुलाब का फूल दुरुस्त है।
इस सारी प्रक्रिया में उसे समय का ध्यान ही नहीं रहा। उसने अपनी कलाई घड़ी की ओर देखा तो साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "टाइम देखते ही उसने अपना हाथ माथे पर दे मारा । उसके मुंह से बरबस निकल गया ," ओ तेरे की!" वो अपने आप को गालियां देता और बुदबुदाता हुआ बस अड्डे से बाहर की तरफ़ भागा। तपती गर्मी में काला सूट और हाथ में गुलाब का फूल लिए झुमरू को भागते देख बस अड्डे पर खड़े लोग उस पर हंसने लगे। अपनी झेंप मिटाते हुए वो झटपट बस अड्डे से बाहर निकल गया। 
अपनी नालायकी पर उसे गुस्सा आ रहा था। वो मन ही मन आधा घंटा देरी के लिए अपने आप को कोसे जा रहा था। झुमरू पसीने में लथपथ इधर - उधर देखने लगा। बस अड्डे के बाहर खड़े लोग और रेहड़ी वाले उसे देख कर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। उसके मन में बुरे विचार दौड़ने लगे। वहां खड़े खड़े वो अपने आप से बात करने लगा,"वो तो कह ही रही थी कि टाइम से आ जाना। मैं ही मूर्ख हूं जिसने समय का ध्यान नहीं रखा।" जो समय रात को काटे नहीं कट रहा था वो अब भागे जा रहा था। उसने घड़ी देखी तो बारह बज रहे थे। उसे सहसा ध्यान आया कि कहीं नीलम मेरा इंतज़ार करते करते ओडियन में ही न चली गई हो। वो एकदम उस तरफ़ भागा और जल्दी के चक्कर में धड़ाम से गिर गया। उसका काला कोट पैंट मिट्टी से सफ़ेद हो गया। अपना पैंट कोट झाड़ कर वो जैसे ही रेस्त्रां में घुसा सब लोग उस पर हंसने लगे। उसने लोगों की परवाह किए बिना वहां बैठे लोगों पर नज़र दौड़ाई, लेकिन नीलम उसे कहीं नहीं दिखाई दी। रेस्तरां लोगों की हंसी से गूंजने लगा था। वो सरपट बाहर की तरफ़ भागा। वो वहां हाथ में गुलाब का फूल लिए बहुत देर तक खड़ा रहा और वहां से गुजरने वाली हर लड़की उसे नीलम नजर आने लगी। वो अपने आप को दोषी मान कर ज़ोर ज़ोर से गालियां निकालने लगा। आने जाने वाले लोग उसे देख कर हंसते हुए निकल जाते। वो अब पूरी तरह से भीग चुका था। उसने कोट उतारा और ज़मीन पर पटक कर अपने पैरों से मसलने लगा। उसके बाद झुमरू कहां चला गया किसी को कोई ख़बर नहीं।

Wednesday, 8 May 2019

पुड़िया (A packet)
I was just passing through a construction  site. What I saw that workers were busy in their assigned jobs. Nobody was concerned that I am clicking them.The children were busy in their games without any worry. Women were working more seriously than male workers. While clicking what I saw that one of the male workers brought out a packet "पुड़िया" from his pocket. This packet is usually called masala or jarda or khainni (one type of tobacco). In this masala chuna is mixed and mixture is taken as intoxication. This mixture is used as relief , which is extreme cancerous. When that fellow was just to get the mixture ready, he saw me. He got squirme and was puzzled to what to do. He immediately put down his packet of tobacco.As soon as he could understand he had been captured.  I went to him and asked, " Why did he try to hide that packet (पुड़िया). He smiled and humbly replied, "  kya बताएं बाबू जी इस से थोड़ा आराम मिल जाता है। इस को न लें तो शरीर टूटने लगता है।" ( "It just give relief to the tired body." ) I questioned him again," Do you know that this intoxication is poison for you?" ("मालूम है ये पुड़िया ज़हर है तुम्हारे लिए?") He innocently replied," this life too is not a nectar. This life is also a packet of poison , Sir . " Ye Zindagi कौन अमृत है बाबू! ये ज़िन्दगी भी तो ज़हर की पुड़िया है ससुरी। " This line really described all his sorrows of life. During our conversation he was busy in making his mixture . He put that mixture under his tongue and started working. I just could not reply him and click another photographs. I just started crooning , " ye Zindagi के मेले दुुनिया में कम न होंगे अफ़सोस हम न होंगे...... ....."

Saturday, 13 April 2019

मोहम्मद जलालुद्दीन उर्फ डोसे वाले डॉक्टर साब।
भाई डॉक्टर अजय शर्मा Ajay Sharma को मेरी ओर से ढेरों बधाई  उनके नाटक मोहम्मद जलालुद्दीन के लिए और शुक्रिया मेरे लिए इस नाटक को उपलब्ध करवाने के लिए।
ये डॉक्टर अजय शर्मा की खासियत है कि जिस काम को वो अपने हाथों में लेते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते। यही कारण है कि वो अब तक 11उपन्यास, 1कहानी संग्रह, एक पंजाबी नाटक " छल्ला मुड़ के नहीं आया। और अब एक हिंदी नाटक " मोहम्मद जलालुद्दीन " लिख चुके हैं । उनके एक उपन्यास " बसरा की गलियां" का  इंग्लिश में अनुवाद भी ही चुका है।
पेशे से डॉक्टर भाई अजय शर्मा साहितिक और लेखन क्षेत्र में आज जिस मुकाम पर पहुंचे हैं,उसके पीछे उनका एक लंबा संघर्ष है।
डॉक्टर अजय शर्मा से मेरी मुलाकात नब्बे के दशक में ,करीब 28 बरस पहले करनाल में हुई थी।80 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के बाद बहुत सारे परिवार पंजाब छोड़ कर आसपास के राज्यों में विस्थापित हो गए थे। कामकाज ठप्प हो गए थे और चैन से जीना मुश्किल हो गया था। डॉक्टर अजय भी अपनी ज़िन्दगी की नई पारी की शुरुआत करने के लिए अपने परिवार और भाई के साथ करनाल अा बसे थे। काम के सिलसिले के लिए कोई दुकान और रहने के लिए मकान की तलाश में उनका मेरे एक दोस्त नवीन की दुकान पर आना जाना होता था। नवीन प्रॉपर्टी डीलर का काम करता था। मेरी मुलाकात उनसे वहीं पर हुई। उनसे बातचीत के बाद विचार मिलने लगे। ख़ाकसार नाटक के क्षेत्र से था और डॉक्टर साहेब भी कभी कभी कोई कहानी किस्सा सुना दिया करते।वो भी बताया करते कि उनकी दिलचस्पी भी एक्टिंग में है। उन दिनों उनकी सुनाई कहानियां मुझे अच्छी लगती।
डॉक्टर साब ने अपने भाई के लिए शहर के बीचों बीच क्लब मार्केट में एक दुकान ले ली और वहां डोसे की दुकान खोल दी। काम चल निकला था। उन दिनों क्लब मार्केट " heart of city" कहलाता था। शहर के नामचीन लोग और कॉलेज के समय में प्रेमी जोड़ों के लिए ये एक ख़ास अड्डा था। डॉक्टर साब जब भी डोसे की दुकान पर आते मुझे फोन करके वहां बुला लेते। अब शाम के वक़्त मेरा ज़्यादातर समय वहीं गुजरने लगा था। नाटक, साहित्य और फिल्मों के बातों के ऐसे दौर चलते की कब रात हो जाती पता ही न चलता। अब बैठक देर रात तक चलने लगी थी। एक दूसरे के घर आना जाना भी होने लगा था। घर में  माता पिता जब देर से आने पर गुस्सा करते तो मैं घर पर सफाई कुछ इस तरह देता , " अरे मैं डोसे वाले डॉक्टर के यहां था, कोई आवारागर्दी थोड़ा ही कर रहा था।" उनको यकीं हो जाए कि मैं वहीं था तो कभी कभी कभी डोसे पैक भी करवा कर ले जाता। इस तरह डॉक्टर अजय शर्मा मेरे घर वालों के लिए "डोसे वाले डॉक्टर साब" हो गए थे।
 व्यक्ति अपनी ज़मीं को कभी नहीं भूल सकता।जब भी हमारी बैठक होती डॉक्टर साब  जालंधर के बारे में बात करना कतई न भूलते।उनकी पत्नी जालंधर में ही सरकारी हस्पताल में कार्यरत थी। वो भी अक्सर लंबी छुट्टी लेकर करनाल अा जाती। डॉक्टर साब का मुंबई जा कर एक्टिंग में अपनी किस्मत आजमाने का इतना जनूं था कि वो सब कुछ छोड़ कर मुंबई भाग जाने का प्लान करने लगे थे। उनकी इस बात से घर के लोग परेशान रहने लगे थे और ख़ासकर उनकी पत्नी।
खैर समय की करवट के साथ डॉक्टर अजय के जीवन में भी परिवर्तन आया और वो करनाल में अपना सब कुछ बेचकर दोबारा जालंधर सेटल ही गए।हालांकि उस समय उन्हें काफी घाटा उठाना पड़ा था।
कहते है कि दिल को दिल से राह होती है। उन दिनों मेरा एक मित्र Puneet Sehgal  आल इंडिया रेडियो में प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव के पद पर कार्यरत था और Daljinder Basran भी वहीं सेटल था। मेरे लिए तो जैसे सोने पर सुहागे जैसा हो गया। पुनीत भाई ऑल इंडिया रेडियो में नाटक विभाग में था और अपने साथियों को रेडियो में रिकॉर्डिंग काम देकर खूब सहयोग करता। मेरा भी ऑल इंडिया रेडियो में रिकॉर्डिंग के सिलसिले में आना जाना लगा रहता था। मैं जब भी जालंधर जाता तो दलजिंदर के घर ही ठहरता। वहां भाई अजय शर्मा का भी आना हो जाता। कई बार तो हम दलजिंदर के घर के बिल्कुल नज़दीक जालंधर के बस स्टैंड के बाहर देर रात तक अपनी बैठक जमाए रहते। तब का बना सिलसिला आज तक बदस्तूर जारी है।
आज भाई अजय शर्मा का लिखा नाटक मोहम्मद जलालुद्दीन हाथ में आया तो मन गदगद हो गया। अब तक चार बार पढ़ चुका हूं। नाटक धार्मिक सौहार्द के लिए एक बेहतरीन सौगात है। नाटक में मध्यम वर्गीय परिवारों के अवचेतन में दबी कश्मकश को बख़ूबी बयां किया गया है। मुंबई के परिवेश पर आधारित इस नाटक के डायलॉग रवानगी लिए हुए हैं और पात्रों के संवादों में ठहराव है। मध्यम वर्गीय पृष्ठ भूमि के पात्रों के संवाद इतनी संजीदगी से बुने गए हैं कि ख़ाकसार को पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो वो उसकी अपनी कहानी हो। भाई अजय शर्मा के इस नाटक में कमाल यह है कि सादगी भरे संवाद पात्रों को जीवंत रखते हैं। जैसे हर व्यक्ति के अवचेतन रूपी कोठरी में अनेक चरित्र अपना डेरा जमाए रहते हैं,मोहम्मद जलालुद्दीन नाटक के पात्रों को को भी कुछ इस तरह ही गढा गया है।बशीर का एक संवाद आदमी के अंदर आदमी की कहानी को बयान करता है, " वैसे भी तुम तो जानती हो कि मेरा दिल भले ही कठोर है,लेकिन कब मोम की तरह पिघल जाए यह तो आज तक बशीर ख़ुद भी नहीं जान सका। नाटक में मुंबई नगरी कि चकाचौंध के पीछे के अंधेरे को अजनबी और सलमा के संवादों के ज़रिए बड़ी सादगी से रेखांकित किया गया है।नाटक के ज़रिए हमारे राजनीतिक सिस्टम पर भी कोठाराघात किया गया है। इस के ज़रिए एक अच्छा संदेश ये देने की कोशिश की गई है कि बेशक चंद लोग जाने अंजाने राजनीतिज्ञों की कठपुतली बन कर नंगा नाच करने लगते हैं लेकिन आम आदमी के अवचेतन में प्रेम,भाईचारा , मानवता और सौहार्द कूटकूट कर भरा हुआ है चाहे वो किसी भी धर्म से संबंध रखते हों। नाटक के अंत तक सस्पेंस बना रहता है। अंत में जिस तरह सलमा अजनबी को हिन्दू और मुस्लिम होने का ज़िक्र करती है, वो साफ दर्शाता है कि आज भी मध्यम वर्गीय लोग अपने आसपास बुने अनचाहे बंधनों की दीवारों को तोड़ना तो चाहते हैं लेकिन संकीर्ण सोच वाले समाज के दबदबे और उनके द्वारा रचित इन दीवारों को तोड़ना शायद बहुत मुश्किल है। ख़ाकसार को लगता है कि नाटक में ऑनर किलिंग का डर भी शायद आम आदमी को अपने सपनों को साकार करने में रोकता है बेशक लेखक ने इस का कहीं ज़िक्र न किया हो। नाटक को सुखद या दुखद न बना कर पाठक और दर्शक को चिंतन या यूं कहें कि आत्मचिंतन के लिए छोड़ देना भाई अजय की काश्तकारी का कमाल है। नाटककार समाज में परिवर्तन तो चाहता है लेकिन इस का निर्णय को दर्शक के ऊपर छोड़ देता यही इस नाटक की खासियत भी है।ऐसा लगता है कि डॉक्टर साब ने अपने अवचेतन में दबी अपनी ही कहानी को "मोहम्मद जलालुद्दीन" के ज़रिए बुनने का काम किया है जो की कतई आसान नहीं होता।
अंत में ढेरों बधाई  भाई अजय शर्मा को एक बेहतरीन सौगात के लिए। जल्द ही मोहम्मद जलालुद्दीन नाटक को मंचित करने का प्रयास करूंगा। इसी बहाने अवचेतन में दबी कुछ अनकही बातें और आप के साथ बिताए कुछ बेहतरीन पलों को यादगार बनाने का मौका भी मिल गया।
" मियां मकबूल "
मियां मकबूल खुशदिल व्यक्ति थे। मिजाज़ ऐसा की हर आदमी उनकी तरफ खींचा चला आता । चेहरा उनका हमेशा खिला रहता। उन्हें फोटोग्राफी का बहुत शौंक था। अपने किस्सों में वो अक्सर फोटोग्राफी का ज़िक्र करते। एक दिन उन्हें न जाने क्या हुआ कि वो अपने दिमाग का संतुलन खो बैठे। शुरू में तो मियां मकबूल कुछ बहकी बहकी बातें करते थे। परिवार के लोगों ने समझा कि मस्ती में रहते हैं इसलिए ऐसा करने लगे हैं। मगर धीरे धीरे वो उलूल जुलूल बातें करने लगे । मियां कभी गीत गाने लगते तो कभी किसी हीरो या विलियन की तरह डायलॉग बोलने लगते। सब लोग उनकी इन हरकतों से हैरान परेशान थे। किसी को भी ये समझ नहीं आया कि आखिर मियां को हुआ क्या है। उनकी बेगम हसीना भी मियां मकबूल के इस तरह के बर्ताव से सकते में थी। हसीना मियां मकबूल से बहुत प्रेम करती थी। वो ख़ुदा से मुखातिब हो बातचीत करते हुए कहती, " या अल्लाह ! ऐसा कौन सा गुनाह किया था जिस की सज़ा मियां को मिल रही है।" घर के लोग अब मियां मकबूल का विशेष ध्यान रखने लगे थे । वो इस बात से सब्र कर लेते कि कई बार मियां को पुरानी बातें याद आ जाती और बिल्कुल सही तरीके से बर्ताव करने लगते।
ख़ैर जब कभी भी वो ठीक होते अपने पुराने दिनों को वो याद करते हुए बताते कि अपने खिलौनों में भी वो कैमेरा ही खरीदते थे। जैसे जैसे बड़े हुए कहीं न कहीं से जुगाड़ कर के कोई नया पुराना कैमरा खरीद लाते। वो बताते की कलर्ड कैमरे का ज़माना नहीं था। ब्लैक एंड व्हाइट कैमरे से ही फोटो खींची  जाती थी। बाद में कुछ एक्सपर्ट फोटो ग्राफर उनमें रंग भर दिया करते।
मियां मकबूल अपने दोस्तों को अपनी पुरानी फोटो दिखा कर बहुत खुश होते । वो अपनी पुरानी यादों को समेटते हुए बताते कि किस तरह एक कोडक कंपनी के कैमरे के लिए वो रील का जुगाड़ करते और फिर उसको धुलवा कर नेगेटिव बनवाते और फिर कुछ चुनिंदा फोटो बनवाते। " भले ज़माने की बात बता रहा हूं, बहुत महंगी होती थीं फोटो ग्राफी! कई कई महीने चलती थी कैमरे की फिल्म! कैमरे का ध्यान तो रखना ही होता था, साथ में इस बात का भी विशेष ध्यान रखना होता कि कहीं कोई कैमरे का शटर न खोल दे। शटर खुला नहीं ,सारी फोटो सफा चट्ट।" ये बताते हुए मकबूल के चेहरे पर चिंता के भाव झलकने लगते। अपने को संभालते हुए वो आगे बताते कि उनके साथ ऐसा कई बार हुआ है। कोई न कोई गलती से शटर का बटन दबा देता और सारी फोटो उड़न छू!
मियां मकबूल को इस बात का बहुत शिकवा था कि वो चाहते हुए भी कोई बढ़िया कैमरा न खरीद सके। बढ़िया से मतलब कोई प्रोफेशनल कैमरा। समय के साथ साथ ज़िम्मेदारियां बढ़ती रही, कमाई का कोई बढ़िया ज़रिया नहीं था, छोटी - मोटी नौकरी करते रहे उम्रभर, थोड़ा बहुत जो कमाते घर का गुज़र- बसर हो जाता। अपने प्रोफेशनल कैमरे को न ले पाने का कारण वो कुछ इस तरह बताते।
बच्चे बढ़े हो चुके थे, उनका बेटा करीम दिल्ली में नौकरी करने के लिए चला गया था। उसे घर से गए चार महीने हो गए थे। हालांकि मलेरकोटला से दिल्ली कोई ज़्यादा दूर नहीं था, बस पांच छह घंटे का ही तो सफ़र था। हां मियां को इस बात से तस्सली थी कि करीम बीच बीच में अपने अब्बा से बात कर लिया करता था।
मियां मकबूल आज ख़ुश नज़र आ रहे थे। वो अपनी खुंडी को घुमाते हुए बरामदे में इधर उधर टहल रहे थे। मानो उन्हें चलने के लिए खुंडी की ज़रूरत ही न हो। जैसे खुंडी तो वो अपने साथ में बस यूं ही रौब रूबाब के लिए रखते हों। बाज़ार से वो फल फ्रूट पहले ही खरीद लाए थे। बरामदे में टहलते हुए वो अपनी बेगम को बार बार आवाज़ लगा कर पूछते कि करीम का कोई फोन आया क्या ? कहां पहुंचा है वो? बेगम चौके में मशगूल थी।  मियां के एक ही सवाल का बार बार जवाब देकर वो परेशान हो चुकी थी। हां ! बस पहुंचने ही वाला होगा। हसीना चूल्हे में फूंक मारते हुए बोलती ।
मियां मकबूल का बरामदे में घूमने का सिलसिला बदस्तूर जारी था। आखिर जिस का इंतज़ार था वो घड़ी भी आ ही गई। करीम ने घर में प्रवेश किया।  करीम ने अपने वालिद से दुआ सलाम की और अपनी अम्मा को मिलने के लिए वो रसोई की तरफ बढ़ गया। मियां अपने बेटे को रसोई की तरफ जाते हुए निहारते रहे और कोई देख न ले कुछ इस तरह वो अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए बोले," बेगम ! संभालो अपने लाल को, हर पल इसी के बारे में सोचती रहती थी न! अब करो जो इस की खिदमत करनी है !" ये कहते हुए मियां घर से बाहर निकल लिए।
मियां मकबूल जब कुछ देर बाद घर वापिस लौटे तो हसीना और करीम बातों में मशगूल थे। अपने बेटे के लिए बनाए गाजर के हलवे को हसीना अपने हाथों से खिला रही थी। मियां ने अपनी बेगम की ओर इशारा करते हुए कहा," कभी हमें भी इस तरह खिला दिया करो बेगम के रूह को सकूं मिले।" ये सुनते ही बेगम ने गाजर के हलवे का एक चम्मच  मियां की ओर बढ़ा दिया।
सर्दियों के दिन थे। मां बेटा रजाई में बैठे थे। मियां ने भी साथ रखी एक और रजाई में अपने पांव घुसेड़ दिए , अपने बेटे की तरफ मुखातिब होते हुए वो बोले," और सुनाओ मियां क्या खबर ? " सब अल्लाह का शुक्र है अब्बा !" करीम ने जवाब दिया। करीम ने अपनी अम्मी की तरफ शरारत भरी नज़रों से देखते हुए अपनी रजाई में से एक डिब्बा निकाल कर अपने अब्बा की ओर बढ़ा दिया। अब्बा ने डिब्बे कस कर पकड़ लिया और हसीना की ओर इस तरह देखा मानो पूछ रहे हों कि तुम तो जानती हो कि आखिर इस में है क्या ! हसीना अपने पति के हावभाव को देखकर मंद मंद मुस्करा रही थी।
मियां मकबूल को समझ नहीं आ रहा था। करीम से उन्होंने पूछते हुए कि डिब्बे में क्या है,झटपट डिब्बे के ऊपर चढ़ा हुआ चमकीला कागज़ उतारना शुरू कर दिया। जैसे जैसे चमकीला कागज़ उतर रहा था उनके चेहरे पर रंगत बढ़ती हा रही थी और मियां मकबूल के दिल की धड़कन तेज़ होती जा रही थी । उनके चेहरे पर खुशी के भाव साफ देखे जा सकते थे। जैसे ही मियां ने डिब्बा खोला उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने अपने बेटे को अपने आगोश में भर लिया और उसे चूमने लगे। वो अपने बेटे की ओर प्यार भरी नज़रों से देखते हुए बोले," ख़ुदा का शुक्र है कि मेरे बेटे ने मेरी बरसों पुरानी मुराद पूरी कर दी। डिब्बे में एक प्रोफेशनल कैमरा देख कर मियां मकबूल की आंखे भर आई। करीम और हसीना मियां को मुस्कुराते हुए निहार रहे थे । कैमरे को इधर उधर घुमाते हुए मियां मकबूल के चेहरे के भाव रंग बदलने लगे थे। वो कैमरे को एक तरफ रखते हुए बोले," कितने का है? बहुत महंगा होगा ?" करीम अपने अब्बा के मन की बात को समझ गया और तुरंत बोला, " आप क्या लेते हो अब्बा! ये बताइए कैमरा अच्छा है न !"  आप के पचासवें जन्मदिन का तोहफा है ये। कुछ दिन पहले ही मियां ने अपना पचासवां जन्मदिन मनाया था और करीम उसमें शरीक नहीं हो पाया था। मियां मकबूल ने फिर से कैमरे को उठा लिया और बोले अब ये तो बताओ कैसे चलेगा। करीम अपने अब्बा को कैमरा ऑपरेट करने का तरीका बताने लगा।
मियां मकबूल की खुशी का कोई ठीकाना न रहा। अब तो मियां हर वक्त कैमरा अपने साथ रखते, मानो अंधे को आंखें मिल गई हों। क्या घर -  क्या बाहर वो कैमरा अपने साथ रखते और फोटो क्लिक करने का कोई मौका न चूकते। कहीं बाहर जाते तो कैमरा अपने साथ रखना कतई न भूलते। अपने दोस्त सलीम को फोन करके अपने साथ शहर के बाहर बनी झील पर जाने का आग्रह करते और सलीम और मकबूल दोनों वहां कई कई घंटे बैठे रहते और फोटो शूट चलता रहता। कैमरा डिजिटल था, कुछ ही दिनों में मियां मकबूल ने हज़ारों फोटो खींच डाली। मियां मकबूल तो सारी दुनिया की खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहते थे। मियां अपनी खुंडी को छोड़ कैमरे को अपने साथ रखने लगे। जहां भी कुछ अच्छा दिखाई देता तुरंत फोटो क्लिक कर लेते।
समय बीतता गया और मियां मकबूल के पास खेत - खलियानों , पेड़ - पौधों, बरसात, पक्षियों - जानवरों, बच्चों , औरतों - पुरुषों, इमारतों, बादलों सूरज - चंदा , लोगों के भाव, उनकी भंगिमाएं और न जाने क्या - क्या!  सब कुछ उनके कैमरे में कैद था।
मियां कई बार तो किसी पार्क में जा बैठते और किसी ख़ास पल को कैद करने के लिए घंटों वहीं डेरा जमाए रहते। समय बीतता गया और मियां मकबूल का फोटो खींचने का जुनून बढ़ता चला गया। मियां के दोस्त सलीम अपने दोस्त के इस जुनून से कई बार खिज भी जाते । एक बार दोनों शाम की सैर के लिए निकले तो मियां मकबूल अपने साथ कैमरा भी ले लिए। सैर के बाद कुछ देर आराम के लिए बैठे तो मकबूल ने अपना कैमरा खोल लिया। सामने से पांच - सात महिलाओं का एक ग्रुप ज़ोर ज़ोर से चहकते हुए आता हुआ दिखाई दिया। सभी औरतों ने चटक रंग के कपड़े डाले हुए थे। उनके ठहाके और चटक रंग के कपड़े किसी रंग बिरंगे आसमान में बादलों की गर्जन का अहसास करवा रहे थे। मियां मकबूल ने झट से कैमरे को ऑटो mode पर डाला और लगे टकाटक फोटो खींचने। वो तब तक क्लिक करते रहे जब तक औरतों का झुंड उनकी आंखों से ओझल नहीं हो गया। मकबूल फोटो खींच कर जब सलीम को फोटो दिखाने लगे तो सलीम मियां फोटो को बड़े चाव से देखते हुए मज़ाक भरे लहज़े से बोले ," मियां कुछ अपनी उम्र का भी लिहाज़ करो ! कभी किसी के हत्थे चढ़ गए तो लेने के देने पड़ जाएंगे।" मियां तो ठहरे मियां वो कहां किसी की सुनने वाले थे। वो अपनी खिचड़ी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहने लगे, " अब फोटो खींचने के लिए किसी की परमिशन लेने की ज़रूरत पड़ेगी क्या ? "
समय बीतता गया और मियां मकबूल का फोटोग्राफी का शौंक भी परवान चढ़ता गया। एक दिन मौसम का मिजाज़ खुशनुमा था। उनकी बेगम मियां को बोली, "जाइए मार्केट से बेसन पकड़ लाइए। आप को पकोड़े बना देती हूं।" मियां तुरंत चल दिए । साथ में कैमरा भी उठा लिया। सोचा कि कुछ अच्छा मिला तो लगे हाथ दो - चार फोटो भी खींच लाएंगे। बेगम ने जब मियां के हाथ में कैमरा देखा तो वो भड़कते हुए बोली," अब ये मुआं कैमरा क्यों उठा लिया साथ में ? सीधे घर चले आना, कहीं कढ़ाई में तेल जलता रहे और मियां वहां फोटो ग्राफी करते रहें।" यह कह कर हसीना बुढ़बुढाने लगी। मियां ने भी "ठीक है, ठीक है।" कह कर बाहर की ओर रवानगी डाल दी। ख़ुदा की नज़रे इनायत देखिए जैसे ही मियां घर से बाहर निकले बूंदा बांदी होने लगी। मियां अपना कैमरा बचाते हुए मार्केट पहुंच गए। जब तक मियां किरयाने की दुकान पर पहुंचे मौसम अपने पूरे शबाब पर पहुंच चुका था। मार्च के महीने में सावन जैसे महीने की रंगत ने मियां का दिल बाग बाग कर दिया। किरयाने की दुकान पर लाला का बेटा अपनी दुकान छोड़ कर अपने मोबाइल से शबाब से भरे हसीं मौसम में आसपास के दृश्यों को कैद करने में मशगूल था। मियां को देखते ही लाला का बेटा खुशी भरे लहज़े में मियां से बोला," देखो चच्चा जान, ख़ुदा का नूर उतर आया है चारों ओर।" लाला का बेटा मियां के फोटोग्राफी के शौंक से बख़ूबी वाकिफ था और वो अपने द्वारा खींची फोटो मियां को दिखाने लगा। मियां में तो लाला के बेटे ने जैसे गुब्बारे में हवा भरने का काम कर दिया। मियां ने तुरंत अपने बैग में से कैमरा निकालते हुए कहा," फोटोग्राफी क्या होती है ये हम अभी तुम्हें  बताते हैं।" चारों ओर लोग अपने मोबाइल निकाल कर धड़ाधड़ फोटो खींचते हुए दिखाई देने लगे। ख़ुदा का नूर देखिए जैसे ही मियां ने अपने कैमरे में बड़ा सा लेंस फिट किया, फिज़ा का रंग अपने पूरे शबाब पर था। ढलते हुए सूरज की रोशनी को बादल ढकने की कौशिश कर रहे थे और ढलते सूरज ने एक ख़ास चमक के साथ  सभी चीज़ों को सोने जैसे रंग में रंग दिया। आसमान पर rainbow ( सप्तरंगी इन्द्रधनुष ) ने तो जैसे चार चांद लगा दिए। सभी इस विहंगम दृश्य को देखकर खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। मियां के  हाथों की अंगुलियों में जैसे रक्त तेज़ी से घूमने लगा था। उन्होंने ने झटपट अपना चश्मा उतारा और अपने कैमरे को चारों तरफ घुमा कर टकाटक क्लिक करने लगे। कहीं आसमां को निहारते युवा युवतियां तो कहीं इन्द्रधनुष को निहारते नन्हें नन्हें बच्चे। एक तरफ किलकारियां मारती युवतियां तो दूसरी तरफ इन्द्रधनुष को अपने मोबाइल में कैद करते अलग - अलग लोग। मियां मन ही मन फूले नहीं समा रहे थे। कुछ लोग मियां को भी क्लिक कर रहे थे। उनके हाथ में प्रोफेशनल कैमरा जो था। मियां मकबूल इस पूरे दृश्य में अपने प्रोफेशनल कैमरा की वजह से सबके आकर्षण का केंद्र बिंदु बने हुए थे।
कैमरा भी जैसे मियां मकबूल की अंगुलियों पर नृत्य करते हुए अपना काम कर रहा था। मियां की एक आंख कैमरा की आंख में लगी हुई थी। कैमरा इन्द्रधनुष के साथ साथ चारों और घूम रहा था। सहसा मियां क्या देखते हैं कि एक ख़ूबसूरत महिला अपनी चौदह पंद्रह साल की बिटिया के साथ इन्द्रधनुष की फोटो खींचने में व्यस्त थीं। मियां के कैमरे को जैसे किसी ने स्टैचू बोल दिया हो और सारे परिदृश्य को भूलकर मां बेटी की फोटो क्लिक करने में जुट गया । मां बेटी दोनों ने सफेद रंग की शानदार जाकेट पहन रखी थी। कैमरा की स्क्रीन पर ऐसा लग रहा था मानो पहाड़ों से बर्फ की दो सिल्लियां ज़मीन पर उतर आई हों।
जैसे ही मियां मकबूल फोटो खींच कर किरयाने की दुकान की ओर मुड़े तो "excuse me" की आवाज़ सुनकर वो पीछे की ओर मुड़े। मां अपनी बेटी के साथ मियां की तरफ ही आ रही थी। मियां ने अपनी तरफ आते हुए देखा तो वो बड़े अदब से उनकी तरफ मुखातिब होते हुए बोले," फरमाइए ! क्या आप मुझसे कुछ कहना चाह रही हैं ?" बर्फ की सिल्ली की तरह दिखाई देने वाली मोहतरमा का मिजाज़ कुछ बदला हुआ दिखाई दे रहा था। वो मियां से बोली, " क्या आपने हमारा फोटो खींचा है?" "जी देखिए!" मियां ने तुरंत अपने कैमरे की स्क्रीन खोल दी और मां - बेटी को उनकी फोटो दिखाने लगे। मियां मन ही मन इतने ख़ुश थे कि उन्हें ऐसा लगने लगा मानों  मां बेटी उनके द्वारा खींची गई फोटो को देख कर ख़ुशी से फूली नहीं समाएंगी। मियां ने भी जब फोटो देखा तो उनके मन में अपनी बेटी यास्मीन और बेगम हसीना के चेहरे उतर आए।  एक लंबे अरसे के बाद मियां को लगा की बेजान तस्वीरें भी बोलती हैं।लेकिन ख़ुदा को तो कुछ और ही मंज़ूर था। फोटो देखकर मोहतरमा किसी आग के गोले की तरह दहकते हुए बोली," how you dared to click our photos without our permission?" ( हमारी इजाज़त के बिना आप की हिम्मत कैसे हुई हमारी फोटो खींचने की?") मियां की ख़ुशी को जैसे ग्रहण लग गया। एकदम से विपरीत परिस्थिति का तो जैसे उन्हें कतई अंदेशा ही न था। मियां अपने आप को संभालते हुए बोले, " Madam , It just went randomly. I was clicking as you and I hadn't any intention to specially click your photo." ( "मोहतरमा ! आप की तरह मैं भी फोटो खींच रहा था और आप की फोटो इत्तफाक से क्लिक हो गई।") मियां इस से पहले कि कुछ और बोलते मोहतरमा ने तुरंत अपना पहले वाला प्रश्न दाग दिया," लेकिन आपने हमारी फोटो बिना इजाज़त के कैसे खींची ? इसको तुरंत डिलीट कीजिए ।" इस बार वो अपना गुस्सा हिंदी में उतार रही थी। साथ ही मोहतरमा ने मियां का पूरा बायोडाटा लेना शुरू कर दिया। मियां मकबूल के मन में कुछ बुरा तो था ही नहीं और वो मोहतरमा को अपने बारे में जानकारी देते चले गए। मोहतरमा किसी वूमेन सैल की इंस्पेक्टर की तरह प्रश्न दागे जा रही थी और थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। मियां किसी कटघरे में खड़े अपने आप को किसी मुजरिम की तरह महसूस करने लगे।  मियां ने उस मोहतरमा को लाख समझाने की कोशिश की लेकिन महिला तो जैसे बात का बतंगड़ बनाने पर आमदा थी। सभी वो लोग जो इन्द्रधनुष की तस्वीरें खींचने में व्यस्त थे मौके की नज़ाकत को समझने के लिए भीड़ में तब्दील होने लगे। लोगों को जमा होते देख महिला बुलंद आवाज़ में चिल्लाने लगी,"देखिए तो सही इस बूढ़े की हिमाकत ! मां बेटी को अकेला देखकर फोटो खींच रहा था।" भीड़ के बीच में से एक युवा उस महिला का साथ देते हुए बोला, " मियां अपनी सफेदी का तो ख्याल किए होते। हमारे इलाके में होते तो आपको दिखा दिए होते बहू - बेटी की के साथ बद्तमीज़ी करने का सिला। इससे पहले कि मियां कुछ बोल पाते काली का रूप धारण करते हुए वो महिला बोली, " अभी डिलीट करिए हमारी तस्वीरों को।" तू कौन मैं खामखां वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए एक लड़का चिल्लाया, " अरे फोटो क्यों डिलीट करनी हैं, कैमरा ही तोड़ डालो इसका।" अपना डायलॉग बोलने के बाद उस लड़के अपने बालों पर हाथ फेरते हुए जमा भीड़ के ओर इस तरह देखा मानो आज का हीरो वही हो।मौके की नज़ाकत को समझते हुए मियां ने तुरंत फोटो डिलीट करने में ही समझदारी समझी। मियां मकबूल के हाथ कांपने लगे थे, पूरा शरीर पसीने से तर बतर हो चुका था। बमुश्किल डिलीट का बटन दबा पाए और इस पूरे प्रकरण में महिला के चेहरे के भाव जस के तस बने हुए थे।
भीड़ मियां पर अपने अपने ढंग से व्यंग कस रही थी। मियां अपने आप को संभालते हुए लाला की दुकान पर पहुंचे, बेसन खरीदा और घर की ओर रवानगी डाल दी। घर में बेगम को ये किस्सा बताएं या न बताएं ये अभी सोच ही रहे थे कि वो घर की ड्योढ़ी के सामने खड़े थे। मियां को देख हसीना ज़ोर से चिल्लाई, मुए कैमरे ने तो आपको सच में पागल बना दिया है।" यह कहते हुए हसीना मियां के हाथ से बेसन का लिफाफा झटक कर ले गई। मियां तो जैसे ज़मीन में ही दफन हो जाना चाहते थे। वो वहीं खड़े खड़े गुनगुनाने लगे," ये रंग बिरंगी दुनिया,ये सत रंगी दुनिया। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है। ये रंग बिरंगी दुनिया, ये सत रंगी दुनिया ।" समय निकाल कर पढ़ लेना।

Thursday, 2 March 2017

BOOK                                CHAANAN PUNJABI PAATH PUSTAK\


ਅਪ੍ਰੈਲ                  :             ਪਾਠ -1              ਪਾਲਣਹਾਰ  ,  ਵਿਆਕਰਣ
                                        Activity             ਪਾਠ -

ਮਈ                    :             ਪਾਠ  - 2            ਚਿੜੀਆ ਘਰ
                                        ਪਾਠ  - 3            ਸ਼ਰਾਰਤੀ  ਪਿੰਕੀ  ,  ਵਿਆਕਰਣ
                                        Activity             ਪਾਠ -

ਜੁਲਾਈ                :             ਪਾਠ  - 4            ਰੇਲ - ਗੱਡੀ
                                        ਪਾਠ  - 5            ਹਾਥੀ  ,  ਵਿਆਕਰਣ  ,   ਫੀਸ ਮਾਫ਼ੀ ਲਈ ਅਰਜ਼ੀ

ਅਗਸਤ              :              ਪਾਠ  - 6           ਅਹਿਸਾਸ
                                        ਪਾਠ  - 7            ਹਫਤੇ ਦੇ ਦਿਨ
                                        ਪਾਠ  - 8           ਸ਼ੁਤਰਮੁਰਗ ,  ਵਿਆਕਰਣ
                                                                ਜੁਰਮਾਨਾ ਮਾਫ਼ੀ ਲਈ ਅਰਜ਼ੀ
                                                                 ਲੇਖ  ,  ਕਹਾਣੀ
                                        Activity             ਪਾਠ  -

ਸਿਤੰਬਰ                            ਪਾਠ  - 9            ਬਿੱਲੀ ਮਾਸੀ  ,  ਵਿਆਕਰਣ

ਅਕਤੂਬਰ                          ਪਾਠ  - 10          ਮਾਂ
                                        ਪਾਠ  - 11          15 ਅਗਸਤ
                                         ਪਾਠ  - 12         ਚਾਚਾ  ਨਹਿਰੂ  , ਵਿਆਕਰਣ  ,  ਲੇਖ  ਅਤੇ ਕਹਾਣੀ
                                        Activity             ਪਾਠ  -

ਨਵੰਬਰ                             ਪਾਠ  - 13         ਟੌਮੀ ,  ਵਿਆਕਰਣ  ,  ਲੇਖ

ਦਿਸੰਬਰ                            ਪਾਠ  - 14         ਪੰਛੀ
                                        ਪਾਠ  - 15        ਸ਼ੇਰ ਤੇ ਬੱਕਰੀ
                                        ਪਾਠ  - 16        ਸੋਨੇ ਦੀ ਮੁਰਗੀ  ,  ਵਿਆਕਰਣ , ਲੇਖ ਅਤੇ ਕਹਾਣੀ
                                        Activity           ਪਾਠ  -

ਜਨਵਰੀ                             ਪਾਠ  - 17        ਬੁਝਾਰਤਾਂ  ,  ਵਿਆਕਰਣ

ਫ਼ਰਵਰੀ                             Revision & Annual Examinations

                                       
          

Sunday, 15 May 2016

Dollar

"संटू की आत्म कथा !"
'डॉलर '
संटू खुश था ! आज उसको अपनी औकात का अहसास हो गया था !
वो ऐसे लोगों की दुनिया को अपना समझने लगा था जहाँ सब कुछ नकली था ! न प्रेम , अहसास और कोई इमोशन !
वैसे कभी adjust भी नहीं हो पाया था वो ऐसे लोगों की दुनिया में जहाँ कभी कोई अपना था ही नहीं  ! उसकी तो अपनी दुनिया थी ! न कोई दिखावा और न कोई आडम्बर ! सीधी - साधी ज़िन्दगी थी उसकी !
तभी तो सब उसको संटू पुकारते ! यानि कि पढ़ा लिखा बेफकूफ !
अपनी दुनिया, अपने लोगों को छोड़ कर वो दिखावे की दुनिया में रमने लगा था ! वैसे ये उसकी नालायकी ही थी ! लेकिन आज उसको समझ आ गया था के वो सच में नालायक ही था तभी तो वो वो नखलिस्तान ( मरुस्थल के बीच हरित भूमि ) खोजने की कोशिश करता रहा !
भूल गया था वो के रमणीय स्थल तो आप का अंतर्मन है ! भटक गया था वो ! लेकिन सुबह का भूला अगर शाम को घर वापिस लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते !
बस इसी बात को लेकर संटू खुश था के वो अपने घर ,अपनी दुनिया में था ! जहाँ सब लोग उसको पहचानते थे , उसकी कद्र करते थे और जहाँ अपनेपन के अहसास के साथ प्यार में आत्मीयता थी !
संटू टी. वी पर चल रही एक advertisement से बेपरवाह था जिस की Time Line कुछ इस तरह थी ," जिन लोगों के कॉलर के नीचे " DOLLAR" होता है , उनसे पंगा नहीं लेते !
संटू खुश था ! आज उसको अपनी औकात का अहसास हो गया था !
"संटू की आत्म कथा" से- साभार !