Saturday, 19 June 2021

झुमरू की प्रेम कहानी

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झुमरू की प्रेम कथा
यह किस्सा लगभग एक साल पुराना है , सैर करते हुए Sameer Paul ने अपनी स्पीड तेज़ कर दी। ये कोई पहली बार नहीं था। समीर की ये आदत है,हमेशा जल्दी में रहता है। लेकिन यदि कोई ख़ास वजह हो तो उसकी जल्दी और बढ़ जाती है। हम दोनों शाम को अटल पार्क में रोज़ाना लगभग 45 से 50 मिनट सैर करते थे। अभी कोई 15 से 20 मिनट की सैर बाकी थी। समीर की तेज़ी के बाद मैंने गैप को कवर करते हुए पूछा, "आज कौन सी ट्रैन पकड़नी है ?" वो अपनी मुंडी पीछे घुमा कर मुस्कुराते हुए बोला,"ड्रीम गर्ल देखने जाना है।" वो अभी पिछले हफ्ते ही छिछोरे फ़िल्म देख कर आया था। उसे सिर्फ फ़िल्म देखने का शौक़ नहीं है बल्कि वो एक अच्छा क्रिटिक भी है। छिछोरे फ़िल्म देखने के बाद उसने फ़िल्म की स्टोरी सुनाते हुए बताया था कि जो व्यक्ति कभी भी होस्टल में रहा है उसे यह फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए। ड्रीम गर्ल के बारे में उसने बताया कि ट्रेलर तो अच्छा लग रहा है। इसमें आयुष्मान लड़कियों की आवाज़ निकाल कर लोगों का बेफकूफ़ बनाता है।
ख़ैर जब उसने ड्रीम गर्ल का ज़िक्र किया तो मैंने उसे बताया कि #nehasaraf ने भी इसका पोस्टर अपने फेसबुक पर डाला हुआ है । उसने तुरंत मुझसे पूछा, "कोई रोल है क्या उसका इस फ़िल्म में ?" "मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है ," मैंने जवाब दिया। रविवार को सैर का schedule सुबह का हो जाता था। कल की सैर के लिए पांच बजे का समय फिक्स हो गया था। जब साढ़े चार बजे तक समीर का फ़ोन नहीं आया तो मैंने ही घंटी बजा दी। वो नींद में था,फ़िल्म देखने के बाद रात देर से लौटा था। नींद में ही उसने आज का कार्यक्रम रद्द करते हुए मुझे बताया। मैंने भी आज सैर कैंसिल करना ही बेहतर समझा। 
मैंने अपने फेसबुक का पिटारा खोला तो फेसबुक पर सबसे पहली पोस्ट नेहा की दिखाई दी। इसमें नेहा ने ट्रेलर का लिंक पोस्ट किया हुआ था। नेहा की पोस्ट से पता चला कि इस फ़िल्म में उसने कोई रोल किया है। मैंने तुरन्त लिंक पर अंगुली दबा दी। ट्रेलर देखकर मज़ा आ गया। आयुष्मान लड़की की आवाज़ निकाल कर बहुत ही खूबसूरती से लोगों को उल्लू बनाता है। ड्रीम गर्ल का ट्रेलर देखते ही मेरे ज़हन में लगभग 20 बरस पुराना एक किस्सा चक्कर लगाने लगा।
मेरे एक मित्र हैं नवीन। जब मैं कॉलेज में पढ़ता था तो वो फ़ोटो स्टूडियो चलाता था।अपनी मेहनत और लगन से आज वो बहुत नामी प्रॉपर्टी डीलर है। यह बात उन दिनों की है जब अधिकतर लोगों के घरों में टेलीफोन नहीं हुआ करते थे। नवीन सुविधा वाली गली से मेला राम स्कूल मार्केट में शिफ्ट हो गया था। उन दिनों लोग टेलीफोन करने के लिए एसटीडी बूथ पर जाया करते थे। मुझे याद है रात को इन बूथों पर लोगों का जमावड़ा लगा रहता था क्योंकि रात के समय कॉल करने के रेट आधे हो जाते थे। टेलीफोन लाइन व्यस्त होने के कारण बहुत सारे लोग बैरंग लौट जाते थे। हमने भी भाई नवीन कि दुकान पर एक एसटीडी बूथ लगवा दिया। सोचा था कि कुछ साइड इनकम हो जाया करेगी। चूंकि प्रॉपर्टी की दुकान थी इसलिए ग्राहकी कम थी। वहां ऑफिस को संभालने वाला छोटा भाई रवि ही उसका हिसाब किताब रखता था। रवि को ज़्यादा काम तो होता नहीं था सो वो फुरसत में अपने दोस्तों को इधर उधर फोन लगा कर मशगूल रहता।
रवि का एक दोस्त गांव से शहर में आकर नौकरी करने लगा था। उसका नाम तो मुझे याद नहीं लेकिन एक सीधा साधा युवक शहर में आकर रहने लगा था। शहर की चकाचौंध से वो बहुत प्रभावित था। किसी राइस मिल में काम करता था। कभी कभी उससे प्रॉपर्टी की दुकान पर मुलाकात हो जाती। हालांकि रवि भी जब गांव से शहर में आया तो बहुत सीधा सा था। लेकिन उसे शहर में आए 10 बरस हो चुके थे और शहर की आबोहवा में घुलमिल गया था और दावपेंच लगाने लगा था। चूंकि रवि बचपन से ही बातूनी था तो अपनी बातों से सब का प्रिय भी बन गया था। हमारी मित्र मंडली का वो ख़ास हिस्सा बन गया था। 
जब भी समय मिलता उसका दोस्त भी उसको मिलने वहां आ जाता। उससे कभी कभी हमारा भी टाकरा हो जाता। हम जब भी फ़ुरसत में होते रवि अपने दोस्त की भोली भोली बातों के किस्से हमें सुनाता रहता। रवि को प्रॉपर्टी के लिए इधर उधर जाना पड़ता था तो तय हुआ कि किसी लड़की या लड़के को टेलीफोन बूथ पर रख लिया जाए। एक लड़की को टेलीफोन बूथ पर रख लिया गया , लेकिन कोई 10 - 15 दिन काम करने के बाद वो नौकरी छोड़ कर चली गई। इसी दौरान एक दिन के लिए रवि के दोस्त की मुलाकात उस लड़की से भी हो गई । उन दोनों की आपस में कोई बात नहीं हुई लेकिन न जाने कैसे वो एक ही बार देखने पर अपना दिल हार बैठा। इस मामले में रवि काफ़ी तेज़ था। उसने अपने दोस्त के मन की बात को भांप लिया। उसने अपने दोस्त की बातें सुनने के बाद अपनी चिकनी - चुपड़ी बातों से उसे पक्का विश्वास दिला दिया कि वो लड़की भी पहली नज़र में उसकी दिवानी हो गई है। हम जब भी दुकान पर जाते तो रवि हमें अपने दोस्त के किस्से मक्खन लगा कर सुनाता और हम भी चटकारे लेकर उसके किस्से सुनते और खूब हंसते। मैंने उसके दोस्त के किस्सों से प्रभावित हो कर उसका नाम झुमरू रख दिया लेकिन झुमरू को उसके नए नाम करण की ख़बर नहीं लगने दी।
झुमरू अधिकतर लंच ब्रेक में नवीन की दुकान पर आता था। जब भी वो उस लड़की के बारे में रवि से पूछता तो उसे कहता कि वो दोपहर को लंच के लिए अपने घर चली जाती है। उसे इस बात की कतई भनक नहीं लगने दी गई कि वो लड़की नौकरी छोड़ कर चली गई है।
एक दिन मैं शाम को दुकान पर पहुंचा तो रवि ने बताया कि झुमरू बेचारा उस लड़की का दीवाना हो गया है और बार - बार उससे बात करवाने को कह रहा है। उन दिनों मोबाइल तो दूर की बात घर पर लैंड लाइन फोन होना भी बहुत बड़ी बात होती थी। उसने अपने ऑफिस का नंबर रवि को दे दिया। थिएटर 🎭 का छात्र होने के कारण मैं भी कुछ आवाज़ें निकाल लिया करता था। पता नहीं उस समय मेरे दिमाग में क्या सूझा और मैंने रवि को झुमरू का नंबर लगाने के लिए बोला। रवि ने भी आव देखा न ताव झुमरू का नंबर लगा दिया। मैं नहीं जानता ये उसकी बदनसीबी या खुश नसीबी थी ,उधर फोन झुमरू ने ही उठाया। रवि के चेहरे पर खुशी के भाव साफ नज़र आ रहे थे। वो बोला," भाई क्या हाल हैं ?" हालचाल पूछने और इधर उधर की बातें करने के बाद उसने उसे कन्फर्म कर दिया कि टेलीफोन बूथ वाली लड़की आई हुई है और वो उससे बात करना चाहती है। झुमरू को सब समझाने के बाद उसने टेलीफोन मेरे हाथ में थमा दिया। मैंने लड़की की आवाज़ में उसे हैलो बोला तो झुमरू की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। झुमरू तो मानो नीलम का सदियों से दीवाना हो। हमने उस लड़की का काल्पनिक नामकरण कर दिया था। अपने दिल की बातें करने के बाद वो सीधा नीलम से मिलने की गुहार लगाने लगा। नीलम ने शुरू में तो न नुकर की लेकिन जल्द ही मिलने का वायदा कर के फ़ोन काट दिया। टेलिफोन पर सभी कान लगा कर बैठे थे और मेरी यानी कि नीलम और झुमरू की बातों का लुत्फ़ उठाते हुए लोटपोट हुए जा रहे थे। मैंने जैसे ही फ़ोन को नीचे रखा सभी हंसते हंसते पागल हुए जा रहे थे और सब की हंसी रोके नहीं रुक रही थी। जब सब की हंसी रुक गई तो आगे की रणनीति तैयार की गई। 
  झुमरू अगले दिन सुबह ही रवि के पास पहुंच गया। जब दोपहर तक नीलम नहीं पहुंची तो उदास मन से बोला," क्या बात रवि आज वो क्यों नहीं आई?" रवि ने उसके छुट्टी पर होने का बहाना लगा दिया। इस तरह हर रोज़ झुमरू और नीलम की बातों और रवि के बहानों का सिलसिला बदस्तूर शुरू हो गया। झुमरू को जब भी मौका मिलता वो अलग अलग समय पर नीलम से मिलने के लिए वहां धावा बोल देता। आख़िर नीलम वहां होती तो उसे मिलती ! चतुर रवि हररोज़ एक नई कहानी बना कर उसे संतुष्ट कर देता। यह सिलसिला करीब दस पंद्रह दिन चलता रहा पर भोला झुमरू बिल्कुल नहीं समझ पाया कि उसके साथ धोखा हो रहा है। यहां सबको हंसने हंसाने में ख़ूब आनंद आ रहा था इसलिए उन दोनों का मिलन कार्यक्रम फिक्स नहीं किया जा रहा था।
आख़िर बहुत दिन मज़े लेने के बाद एक दिन झुमरू से बात करते - करते नीलम ने दो दिन बाद सशर्त मिलने का वायदा कर ही डाला। झुमरू भावुक होते हुए बोला," नीलम आप मुझे धोखा तो नहीं दे रही हो न!" नीलम ने भी बड़ी सादगी से पूछा," मैंने तो आपको एक बार ही देखा है और मुझे तो आपकी अब शक्ल भी याद नहीं! ऐसे में मैं आप को कैसे पहचानूंगी!" झुमरू बोला," लेकिन मैं तो आपको पहचानता हूं। आप बस अड्डे के सामने ओडियन स्वीट्स के सामने आ जाना। मैं आपको पहचान लूंगा और वहीं ओडियन में कुछ देर के लिए बैठ जाएंगे," झुमरू ने समस्या का समाधान करते हुए अपनी बात रखी। उन दिनों ओडियन स्वीट्स एंड रेस्तरां युवाओं की बैठक के लिए एक ख़ास जगह थी। 
इधर नीलम ने भी भोलेपन से बात करते हुए कहा," न बाबा न ! ऐसे तो बिल्कुल भी नहीं! कोई मुझे और मिल गया और मेरा किडनैप कर के ले गया तो मैं तो किसी को मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहूंगी।" नीलम के बातें सुनकर झुमरू असमंजस में पड़ गया और उसने चुप्पी साध ली। मौके की नज़ाकत को समझते हुए नीलम एक नया दांव खेलते हुए बोली," ऐसे नहीं हो सकता कि हम कहीं और मिल लें!" झुमरू बड़ी सादगी से बोला," ये जगह ठीक है। यहां पुलिस का भी डर नहीं है। उन दिनों युवा जोड़ों पर पुलिस बहुत सख़्ती करती थी और ऐसे जोड़ों को ब्लैकमेल करके ख़ूब माल बनाती थी। नीलम ने उसके डर को भांपते हुए चुटकी ली, " जो आप जगह बता रहे हो वो सुरक्षित तो है ?" " हां ! हां ! बिल्कुल सुरक्षित है," झुमरू सफ़ाई देते हुए बोला। हालांकि झुमरू कभी इस रेस्त्रां में नहीं गया था। इधर रवि और दूसरे साथी लोगों की हंसी थम नहीं रही थी सभी फोन पर कान लगा कर एक दूसरे के साथ सटके खड़े थे। उधर झुमरू नीलम की बातों से बेशक परेशान था पर इस बार मिलने का मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहता था।
बातचीत लंबी हो चुकी थी लेकिन सभी लोग इतने आनंदित थे कि यह सिलसिला थमने देना नहीं चाहते थे और बार बार अपने हाथों से इशारा कर के बात को आगे बढ़ाने को कह रहे थे। इसलिए नीलम ने अपनी शर्तों के पिटारे में से एक शर्त और रख दी। नीलम बोली," आप क्यों मिलना चाहते हो मुझ से। मेरी बहन बताया करती है कि अकेले में लड़के मौका देख कर लड़कियों से छेड़छाड़ करने लगते हैं। वो कहती है कि लड़के ऐसे में च्यूंटी मार देते हैं।" इससे पहले कि झुमरू कुछ बोलता नीलम ने बात को आगे बढ़ाते हुए फिर एक प्रश्न दाग दिया," अच्छा ये बताओ! जब हम मिलेंगे तो आप च्यूंटी तो नहीं मारोगे!" ये संवाद बोलते ही नीलम भी अपनी हंसी का फव्वारा नहीं रोक पाई और उसकी हंसी की आवाज़ दूसरी तरफ़ न जाए उसने स्पीकर पर हाथ रख लिया। "च्यूंटी! आख़िर मैं तुम्हें च्यूंटी क्यों मरूंगा!" झुमरू सफ़ाई देते हुए बोला। वो नीलम की अटपटी बातों पर हैरान हो रहा था।
नीलम मिलने के लिए स्थान और समय तय करने से पहले बहुत सारी पहेलियां बुझाने के लिए झुमरू को देती रही और झुमरू घुमाफिरा कर मिलने की बात पर ले आता। आख़िर में यह तय हुआ कि एक दिन बाद ओडियन स्वीट्स पर ही मिला जाएगा। लेकिन मिलने से पहले नीलम ने एक शर्त और रख दी। गर्मियों के दिन थे। नीलम ने यहां अपना नया पैंतरा खेला। "देखो आप ऐसा करना परसों जब आप वहां आओ तो कोट पैंट में आना और आप के हाथ में गुलाब का फूल होना चाहिए," नीलम ने बहुत ही प्यार भरे अंदाज़ में उसे बोला। "कोट पैंट !" झुमरू बोला। वो कुछ और बोलता उससे पहले ही नीलम ने बड़ी सादगी से उसे समझाते हुए कहा," मैं समझती हूं कि गर्मियों के दिन हैं,परंतु इससे आप को पहचानने में आसानी होगी। हां ! आप पूरे 11 बजे वहां पहुंच जाना, कहीं मैं वहां पहुंच कर बगुले झांकती फिरूं। ध्यान रहे गुलाब का फूल लाना बिल्कुल न भूलना। अच्छा अब मैं फ़ोन रखती हूं।" यह सब कह कर नीलम ने फ़ोन रख दिया।
झुमरू नीलम की इस अटपटी शर्त से बिलकुल नहीं घबराया। वो लगा अपना दिमाग घुमाने कि आख़िर पैंट कोट का इंतज़ाम कहां से किया जाए। इधर रवि और वहां मौजूद सभी लोगों का हंसते हंसते पेट फटने को हो रहा था।
सभी संभले भी नहीं थे कि ट्रिन ट्रिन करके फ़ोन बजने लगा। ट्रिन ट्रिन की आवाज़ सुनकर सभी समझ गए कि हो न हो यह फ़ोन झुमरू का ही होगा। रवि की हंसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी। उसने हंसते हंसते फ़ोन का रिसीवर उठाया। उधर से झुमरू की आवाज़ थी। झुमरू की आवाज़ सुन कर रवि और ज़ोर से हंसने लगा। झुमरू और रवि के बीच करीब एक घंटा बात चलती रही ।

झुमरू ने नीलम के साथ हुई बातचीत का कोई ज़िक्र नहीं किया। इधर उधर की बातें करने के बाद वो रवि से बोला," भाई तेरे पास पैंट कोट है न काले वाला !" "पैंट कोट! " रवि ने आश्चर्य से पूछा। "हां भाई, पैंट कोट काले रंग का," दूसरी तरफ़ से झुमरू बोला। रवि की हंसी का फव्वारा दोबारा फूटने लगा था। बमुश्किल अपनी हंसी को रोकते हुए वो बोला," भाई इतनी गर्मी में पैंट कोट का क्या करेगा?" झुमरू तो जैसे इस सवाल के जवाब की तैयारी पहले से ही किए हुए था। वो झट से बोला," भाई शादी में जाना है।" "लेकिन इतनी गर्मी में पैंट कोट कौन पहनता है भाई ! और वो भी काले रंग का!" रवि हंसते हुए बोला। इस बार भी झुमरू सवाल का जवाब देने के लिए तैयार था। "भाई बारात सहारनपुर शहर मैं जावेगी , बस इसलिए सोच रहा था," झुमरू ने बड़ी चतुराई से जवाब दिया। रवि मुस्कुराते हुए बोला," अच्छा ये बात है! भाई ने बारात में जाना है।" रवि ने अपना पैंट कोट घर से लेने के लिए कहा। 
झुमरू अपनी चतुराई पर फूला नहीं समा रहा था। उसने इस समस्या का भी हल निकाल लिया था।
मुलाकात का दिन इतवार को मुकर्रर था। रात भर झुमरू करवटें बदलता रहा।उसे नींद नहीं आ रही थी। वो रात भर मुंगेरी लाल की तरह सपने बुनता रहा। रात इतनी लंबी होती है उसे आज पता चला था। ख़ैर सुबह उठते ही वो अपने खेतों की ओर निकल लिया। खेतों में ट्यूबवेल के साथ बनी क्यारी में लगे सभी गुलाब के फूलों को तोड़ कर एक लिफाफे में रख लिया। वो किसी प्रकार का रिस्क नहीं लेना चाहता था। इसलिए उसने बहुत सारे फूल तोड़ लिए। कुछ देर वो ट्यूबवेल पर ही बैठा नीलम के बारे में सोचता रहा। जब वो घर वापिस जा रहा था तो उसे ख़्याल आया कि अगर वो कोट डाल कर घर से निकला तो सभी उसपर शक करेंगे और मज़ाक उड़ाएंगे। घर पहुंचते ही उसने सब से पहले कोट को छिपाने का प्रबंध किया। कोई लिफाफा तो उसे मिला नहीं तो उसने खाद की बोरी में कोट को बंद कर दिया। सब कुछ दुरुस्त कर लेने के बाद उसने घड़ी को देखा तो अभी सात ही बजे थे। उसे लगा समय जैसे थम सा गया है। उसने घड़ी को ध्यान से देखा, वो चल रही थी।
जैसे -तैसे दस बजे,झुमरू ने चलने की तैयारी शुरू कर दी। उसने अपने कोट वाली बोरी को अपने मोटर साइकिल के पीछे लगे कैरियर पर बांधा और खूंटी पर टंगे एक झोले में फूलों वाला लिफाफा डाल कर अपने मोटर साइकिल के हैंडल पर टांग लिया। बरामदे के कोने में बने चूल्हे पर उसकी मां रोटियां सेक रही थी। अपने बेटे को तैयारी करते हुए देखा तो आश्चर्य से बोली,"आज काम के लिए देर नहीं हो गई!आ जा बेटा गर्म गर्म रोटी खा ले और मैंने साथ के लिए भी बांध दी हैं।" झुमरू की मां हर रोज़ दोपहर के लिए रोटियां बांध देती थी। "आज मुझे फैक्ट्री के काम से बाहर जाना है, वहीं कुछ खा लूंगा।" मां की बात का जवाब देते ही उसने मोटर साइकिल पर किक लगाई और घर से बाहर हो लिया।
रास्ते में वो सोचता रहा कि आख़िर वो नीलम से कैसे बात करेगा! किसी फिल्मी हीरो की तरह उसके हाथों को अपने हाथों में पकड़ कर और उसकी आंखों में आंखें डाल कर वो आज अपने मन की बात नीलम को कह ही डालेगा। अभी वो सब सोच ही रहा था कि वो अपने गंतव्य पर पहुंच गया। 
उसने अपनी योजना के अनुसार मोटर साइकिल ओडियन के सामने बस अड्डे में बने स्कूटर स्टैंड में खड़ी कर दी। अपने कोट वाली बोरी में से कोट निकाला और फूल वाला लिफाफा उठा कर वो अड्डे पर बने पेशाब घर में घुस गया। वहां गंदी बास से उसका दम घुटने लगा। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसपर तो नीलम से मिलने का जनून सवार था। एक दीवार पर धुंधला चुके आईने के सामने खड़े हो कर उसने कोट डाला और अपने को उस आईने में निहारने लगा। उसे कुछ साफ नज़र नहीं आ रहा था। उसने लिफ़ाफे में रखे फूलों को कोट की जेब में रखा और इधर उधर देखकर उस लिफ़ाफे से आइना साफ करने लगा। आईना समय के साथ बुरी तरह से गंदा और धुंधला हो चुका था। उस पर लिफ़ाफे की रगड़ाई का कोई ज़्यादा असर नहीं पड़ा लेकिन उसको अपनी धुंधली छवि नज़र आने लगी थी। मोटर साइकिल पर आने की वजह से उसके बाल किसी रेगिस्तान में लगे कंटीले झाड़ की तरह दिखाई दे रहे थे। आईने के नीचे लगे वाश बेसिन में लगी टूंटी से पानी बह रहा था। इस वाश बेसिन की हालत आईने से भी ज़्यादा बदतर थी। #वो #किसी #भरे #ज़ख्म #की #तरह #लग #रहा #था #और #टूंटी #से #बूंद #बूंद #बहता #पानी #उस #ज़ख्म #से #रिसते #मवाद #सा #दृश्य #बना #रहा #था। झुमरू ने अपने दोनो हाथ उस टूंटी के नीचे रख दिए और पानी को अपने मुंह और सिर पर लगा कर अपनी जेब से कंघी निकाल कर अपने बाल सेट करने लगा। जब उसे सब दुरुस्त लगा तो वो उस अंधेरे वाश रूम से बाहर निकल आया।
बाहर निकलते ही उसकी जान में जान आई। वो पसीने से तर बतर हो चुका था। उसने पैंट की जेब में हाथ मारा तो रुमाल नदारद था। उसे याद आया कि जल्दी जल्दी में वो रुमाल लेना तो भूल ही गया। उसने दीवार की तरफ़ अपने को घुमा लिया और माथे का पसीना अपनी बाजू से ही साफ़ कर लिया। कोट की जेब में धीरे से हाथ डाल कर पक्का कर लिया कि गुलाब का फूल दुरुस्त है।
इस सारी प्रक्रिया में उसे समय का ध्यान ही नहीं रहा। उसने अपनी कलाई घड़ी की ओर देखा तो साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "टाइम देखते ही उसने अपना हाथ माथे पर दे मारा । उसके मुंह से बरबस निकल गया ," ओ तेरे की!" वो अपने आप को गालियां देता और बुदबुदाता हुआ बस अड्डे से बाहर की तरफ़ भागा। तपती गर्मी में काला सूट और हाथ में गुलाब का फूल लिए झुमरू को भागते देख बस अड्डे पर खड़े लोग उस पर हंसने लगे। अपनी झेंप मिटाते हुए वो झटपट बस अड्डे से बाहर निकल गया। 
अपनी नालायकी पर उसे गुस्सा आ रहा था। वो मन ही मन आधा घंटा देरी के लिए अपने आप को कोसे जा रहा था। झुमरू पसीने में लथपथ इधर - उधर देखने लगा। बस अड्डे के बाहर खड़े लोग और रेहड़ी वाले उसे देख कर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। उसके मन में बुरे विचार दौड़ने लगे। वहां खड़े खड़े वो अपने आप से बात करने लगा,"वो तो कह ही रही थी कि टाइम से आ जाना। मैं ही मूर्ख हूं जिसने समय का ध्यान नहीं रखा।" जो समय रात को काटे नहीं कट रहा था वो अब भागे जा रहा था। उसने घड़ी देखी तो बारह बज रहे थे। उसे सहसा ध्यान आया कि कहीं नीलम मेरा इंतज़ार करते करते ओडियन में ही न चली गई हो। वो एकदम उस तरफ़ भागा और जल्दी के चक्कर में धड़ाम से गिर गया। उसका काला कोट पैंट मिट्टी से सफ़ेद हो गया। अपना पैंट कोट झाड़ कर वो जैसे ही रेस्त्रां में घुसा सब लोग उस पर हंसने लगे। उसने लोगों की परवाह किए बिना वहां बैठे लोगों पर नज़र दौड़ाई, लेकिन नीलम उसे कहीं नहीं दिखाई दी। रेस्तरां लोगों की हंसी से गूंजने लगा था। वो सरपट बाहर की तरफ़ भागा। वो वहां हाथ में गुलाब का फूल लिए बहुत देर तक खड़ा रहा और वहां से गुजरने वाली हर लड़की उसे नीलम नजर आने लगी। वो अपने आप को दोषी मान कर ज़ोर ज़ोर से गालियां निकालने लगा। आने जाने वाले लोग उसे देख कर हंसते हुए निकल जाते। वो अब पूरी तरह से भीग चुका था। उसने कोट उतारा और ज़मीन पर पटक कर अपने पैरों से मसलने लगा। उसके बाद झुमरू कहां चला गया किसी को कोई ख़बर नहीं।