Sunday, 15 May 2016

Dollar

"संटू की आत्म कथा !"
'डॉलर '
संटू खुश था ! आज उसको अपनी औकात का अहसास हो गया था !
वो ऐसे लोगों की दुनिया को अपना समझने लगा था जहाँ सब कुछ नकली था ! न प्रेम , अहसास और कोई इमोशन !
वैसे कभी adjust भी नहीं हो पाया था वो ऐसे लोगों की दुनिया में जहाँ कभी कोई अपना था ही नहीं  ! उसकी तो अपनी दुनिया थी ! न कोई दिखावा और न कोई आडम्बर ! सीधी - साधी ज़िन्दगी थी उसकी !
तभी तो सब उसको संटू पुकारते ! यानि कि पढ़ा लिखा बेफकूफ !
अपनी दुनिया, अपने लोगों को छोड़ कर वो दिखावे की दुनिया में रमने लगा था ! वैसे ये उसकी नालायकी ही थी ! लेकिन आज उसको समझ आ गया था के वो सच में नालायक ही था तभी तो वो वो नखलिस्तान ( मरुस्थल के बीच हरित भूमि ) खोजने की कोशिश करता रहा !
भूल गया था वो के रमणीय स्थल तो आप का अंतर्मन है ! भटक गया था वो ! लेकिन सुबह का भूला अगर शाम को घर वापिस लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते !
बस इसी बात को लेकर संटू खुश था के वो अपने घर ,अपनी दुनिया में था ! जहाँ सब लोग उसको पहचानते थे , उसकी कद्र करते थे और जहाँ अपनेपन के अहसास के साथ प्यार में आत्मीयता थी !
संटू टी. वी पर चल रही एक advertisement से बेपरवाह था जिस की Time Line कुछ इस तरह थी ," जिन लोगों के कॉलर के नीचे " DOLLAR" होता है , उनसे पंगा नहीं लेते !
संटू खुश था ! आज उसको अपनी औकात का अहसास हो गया था !
"संटू की आत्म कथा" से- साभार !