यादें
मैं याद कर रहा हूँ उन दिनों( 1987 -88 ) को जब हम लोग पंजाब यूनिवर्सिटी में इंडियन थिएटर डिपार्टमेंट में थे। जब भी समय मिलता डिपार्टमेंट के बाहर जमावड़ा जम जाता। अमरजीत ,पुनीत सहगल ,फ़्लोरा , बाठ, अरोड़ा , कमल मलिक , दलजिंदर और रघवीर ये सभी लोग हमारे से एक बैच सीनियर थे। इस बैच में अधिकतर सभी लोग पंजाब से ही थे। साथ में ही हॉस्टल था लेकिन जब भी मौका मिलता शाम को सभी अपने -अपने घर की ओर रुखसत कर लेते। कौन कितने दिनों के बाद डिपार्टमेंट वापिस आएगा ,कुछ पता नहीं होता था। डिपार्टमेंट तो जैसे आरामगाह था। ऐसा नहीं कि सभी का यही हाल था ,इनमे से कुछ लोग सीरियस भी थे। इनमें दलजिंदर एक था जो कि सभी को कोसता रहता था। जब कभी इनके दर्शन हो जाते ,सभी ऐसे प्रोजेक्ट करते मानो दुनिया में इनसे सीरियस लोग ही न हों।
डिपार्टमेंट के बग़ल में ही हॉस्टल कैंटीन थी। बड़े -बड़े छायादार पेड़ों के नीचे महफ़िल जम जाती और फिर शुरू होता बातों का सिलसिला। आज कल की स्टैंडिंग कॉमेडी की तरह ये सभी दूसरों का मज़ाक करने में सिद्धहस्त थे। रघवीर ,पुनीत सहगल ,बाठ और अमरजीत का अपना अलग ग्रुप था। पुनीत का अपना अलग अंदाज़ था। जिस से भी मिलता , कुछ इस तरह से मिलता के साथ बैठे लोगों का शुगल हो जाता। अमरजीत अपने ग्रुप के सभी लोगों से बिलकुल अलग था। । लेकिन उसका व्यक्तित्व कमाल का था। शांत स्वभाव अमरजीत हमेशा किसी उधेड़ बुन में लगा रहता। शब्दों का वो ज़बरदस्त खिलाडी था। हमेशा कुछ न कुछ लिखता रहता। एक्टर तो वो कमाल का था। पुनीत ने पिछले दिनों सूचना दी कि अमरजीत इस दुनिया को अलविदा कह कर हमेशा के लिए रुख़सत हो गया है। अमरजीत की आकस्मिक मृत्यु पर अपने फेस बुक पर पुनीत ने कुछ इस तरह लिखा ,
Serial Bhagan Waliya di shooting diya kuj yaadan .
पिछले तीन महीने (मार्च /अप्रैल/मई -2015 ) कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। पिछले 10 साल से एक स्कूल में कार्यरत हूँ। स्कूल की दूसरी ज़िम्मेदारियों के साथ -साथ इन दिनों में किसी सेल्समेन की तरह स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ाने का दबाव बना रहता है।शिक्षा क्षेत्र में निजीकरण के कारण विद्यालयों में बच्चों की संख्या बढ़ाने की इतनी प्रतिस्पर्धा हो गई है कि शिक्षा के मंदिर अब मार्केटिंग ऑफिस की तरह काम करने लगे हैं। बच्चों और उनके मातापिता को लुभाने के ऐसे हथकंडे अपनाए जाते हैं कि मातापिता के लिए ये समय संकट भरा बन जाता है। महंगी होती शिक्षा , बीमार व दिशाहीन शिक्षा प्रणाली ,शिक्षा का गिरता स्तर ,कमज़ोर सरकारी नीतियां और अपंग सरकारी शिक्षा ढांचा ये कुछ ऐसे कारण हैं ,जिनकी वजह से शिक्षा के मायने बदल गए हैं। यही नहीं एक आम आदमी के लिए अपने बच्चों को पढ़ाना बहुत मुश्किल हो गया है। खासतौर पर मेहनतकश माँ बाप अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा कर बढ़ने का सपना बुनते हैं ,लेकिन महंगी होती शिक्षा के कारण ऐसे अधिकतर लोगों के सपने बिखर ही जाते हैं।
आज कल गर्मी की छुट्टियां चल रही हैं। कई बार दिन काटना भी मुश्किल हो जाता है। स्कूल में दिन कैसे बीत जाते हैं इस का पता ही नहीं चलता। बच्चों की दुनिया में रहते रहते मेरा मन भी बच्चों जैसा हो गया है। एक अच्छी टीम बन गई है। सभी अपना काम जिम्मेदारी से करने लगें तो काम में आनंद की अनुभूति होना स्वाभाविक। है। नवज्योत ,सुनीता भंडारी ,मंजू , संगीता ,पूनम ,रेनू , मोना ,उमीशा व पूजा जैसे कर्ण परिवार का हिस्सा ही बन गई है।
24 अप्रैल को दिल्ली और 27 को चंडीगढ़ नीशू खन्ना के सगन और विवाह समारोह में शिरकत की। बच्चों संग विवाह समारोह में जाना अच्छा लगा। भांजे नीशू खन्ना ने प्रेम विवाह किया है।
पिछले तीन महीनों में मौसम का मिज़ाज ठंडा रहा। कभी बरसात तो कभी ठंडी हवाओं ने मौसम में ठंडक बनाए रखी। अपने जीवन में अप्रैल और मई के महीनों में इतनी ठंडक पहली बार महसूस की।
अच्छा दोस्तों फिर मिलते हैं ! मेरे अगले खत का इंतज़ार कीजिएगा !
