Sunday, 15 September 2013

Dard........

कल जैसे ही उस ने मेरे ऑफिस में कदम रखा तो मैने उस  से पूछा ,"क्या हाल हैं भई"। स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी।दिन भर की ज़दोजहद के बाद मैं कुछ रिलैक्स होने के मूड में था। इस लिए मैने उस को इस तरह से संबोधित कर दिया।  उस के चेहरे पर भी दिन भर की थकावट  साफ़ नज़र आ रहा थी । मैने उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और  पूछा तुम्हें कंप्यूटर चलाना आता है क्या ?हाँ ,थोड़ा बहुत चला लेती हूँ,उस ने जवाब दिया। बहुत अर्सा हो गया सीखे हुए ,अब प्रैक्टिस नहीं रही। क्यों क्या हुआ सर , उस  ने  पलट कर सवाल किया। मै चाहता था के कंप्यूटर का  काम अब  तुम संभाल लो। तुम्हारे घर में कंप्यूटर या लैपटॉप तो होगा ही। हाँ !है ना। वो थोड़ी देर के लिए कुछ सोचने लगी और बोली, लेकिन मै उसे यूज़  नहीं करती।  ऐसा क्यों !उस की ये बात सुन कर मै थोड़ा  असमंजस में पड़ गया था। मै अब उस के चेहरे के  एक्सप्रेशंस  पढ़ने  की  कोशिश  करने लगा। हालाँकि उस ने अपनी बात को बेबाकी से कह दिया था और मुझे उस की बात समझ भी गई थी, फिर भी मैने अपना प्रश्न दोहराया ,ऐसा क्यों ?लैपटॉप इन की बहन ने भेजा है कनाडा से। एक दिन मै उस को देख ही  रही थी के  इन्होंने मुझे टोकते हुए कहा ,"देखियो ,ध्यान से !कहीं खराब ना हो जाए"। वो दिन और आज का दिन मैने आज तक उस को हाथ नहीं लगाया। उस  के  चेहरे पर दर्द की लकीरें उभरने लगी और उस की आवाज़ भर आई। इस से पहले भी वो "अपनों"के बारे में जाने अनजाने बात करती रही थी पर  आज के किस्से ने मुझे अंदर तक हिला  दिया।कुछ देर की चुप्पी के बाद जब मैने उसे  देखा तो उस के  चेहरे पर दर्द से  उभरी  लकीरें कमज़ोर पड़  चुकी थी।